रविवार, 22 अक्तूबर 2017

Chakras Alignmnets(कुण्डलिनी चक्रों का संरेखण (मार्गरेखा ) क्या हैं ये कुण्डलिनी चक्र ? संस्कृत भाषा में चक्र शब्द का अर्थ है चक्का या वील ये चक्र और कुछ नहीं हैं मात्र ऊर्जा बिंदु हैं मेरुदंड या रीढ़ पर कुछ ख़ास जग़हों पर रेखांकित ,वैसे ही जैसे डीएनए की कुंडली पर सुनिश्चित स्थानों पर गुणसूत्र बैठे हैं। )

कुण्डलिनी चक्रों का संरेखण (मार्गरेखा )

क्या हैं ये कुण्डलिनी चक्र ?

संस्कृत भाषा में चक्र शब्द का अर्थ है चक्का या वील ये चक्र और कुछ नहीं हैं मात्र ऊर्जा बिंदु हैं मेरुदंड या रीढ़ पर कुछ ख़ास जग़हों  पर रेखांकित ,वैसे ही जैसे डीएनए की कुंडली पर सुनिश्चित स्थानों पर गुणसूत्र बैठे हैं। 

भारत धर्मी समाज में सम्मानीय स्थान प्राप्त हमारे ऋषियों मुनियों ने बतलाया था विविध वर्णी स्पेक्ट्रम के रंगों की मानिंद ऐसे सात नर्तनशील चक्र  हमारे शरीर तंत्र में मौजूद हैं।इनका यह नर्तन (spin or rotation )उसी दिशा में है जिसमें घड़ी की सुइयां घूमतीं हैं (clock waise ).हमारे शरीर का एक सशक्त स्रावी तंत्र हैं इनमें  से कई चक्र। 

यह महज़ इत्तेफाक है या कुछ और इन चक्रों  के बीच जो परस्पर अंतर है अंतराल है इंटरवल है दूरी है वह हमारी शरीर रचना के स्रावी -तंत्र केंद्रों (endocrine centers  )के बीच के अंतराल से मेल खाती  है। मैच करती  है। वैसा ही है। 

क्या है इनकी अवस्थिति और वर्ण ?
Location and their Color

यूं शरीर की ७२००० नाड़ियाँ जहां -जहां आकर मिलतीं हैं वहां -वहां ये ऊर्जा केंद्र मौजूद हैं लेकिन यहां हम उन प्रमुख सात चक्रों का ही उल्लेख कर रहें हैं जो हमारे शरीर  के केंद्रभाग  के ही गिर्द है। 
'That are located along the center of the body '.

(१ )पहला चक्र मूलाधार (the Root Chakra ):हमारे प्रजनन अंगों (गुदा और अंडकोष या फिर गुदा और योनि )के बीच बतलाया गया है। यही हमारी रीढ़ का आधार ,वक्ष बांस (cocciyx or tail bone of the back )है। यही केंद्र  है हमारे प्रजनन क्षेत्र और प्रजनन अंगों का। 

इसकी आभा रक्तिम ,रक्त वर्णी (लाल )बतलाई गई है। 

(२ )दूसरा Belly Chkra या अधिष्ठान चक्र है यह हमारे पेड़ु में स्थित है नाभि से थोड़ा नीचे उदर का यही निचला भाग है जो पहले चक्र मूलाधार और नाभि के बीच पड़ेगा। 

इसका आधार भी रीढ़ (मेरुदंड ).यह लंबर रीजन के गिर्द अवस्थित है। लंबर रीजन छाती (थोरासिक रीजन  )और सेक्रम के बीच इसकी अवस्थिती बतलाई गई है। sacrum कमर के पीछे की तिकोनी हड्डी होती है जिसे त्रिकास्थि भी कह देते हैं। 

चिकित्सा विज्ञान की भाषा में कहे तो यह L1 के गिर्द है। (लंबर रीजन मोटी भाषा में कमर का निचला हिस्सा या है यह L1 से L5 तक का क्षेत्र है। जिनका प्रोलेप्स  डिस्क से पाला पड़ा है वह जानते हैं क्या चीज़ है ये लंबर रीजन। भगवान् आप सबको बचाये रहे स्लिप या प्रोलेप्स डिस्क से। 

इस बेली -वील को नारंगी (ORANGE )बतलाया गया है। 

(३ )तीसरा चक्र Solar Plexus (स्नायु गुच्छ या सौर -जालक ,सौर -जाल )कहलाया है। 

यह स्टर्नम (छाती के बीचों -बीच की हड्डी )के बस थोड़ा सा नीचे लेकिन नाभि के ठीक ऊपर का क्षेत्र है जहां यह तीसरा चक्र मौजूद है। 

मेरुदंड पर इसकी अवस्थिति eighth thoracic vertebra है। जिसे रीढ़ का आठवाँ जोड़ भी कह सकते है। 

इस चक्र का संबंध हमारे अधिवृक्क (गुर्दों से सम्बंधित adrenal ),आमाशय (stomach )और अग्नाश्य (pancreas )से जोड़ा गया है। 

एड्रिनेलिन (इसे स्ट्रेस हॉर्मोंन भी कहा गया है )बनाने के लिए एड्रिनल ग्लेंड तथा इन्सुलिन हारमोन तैयार करने के लिए हमारी अग्नाशय  ग्रंथि सुविख्यात रहीं हैं। 

ज़ाहिर है हमारे स्रावी -तंत्र(endocrine system ) के ये चक्र चौकीदार रहे हैं जो हमारे भाव -अनुभव मनोभावों का संचालन किये रहते हैं। 

इस चक्र को  पीत वर्ण(पीला रंग ) मिला है कृष्ण के पीताम्बर सा। 

(४ )चौथा अनाहत या Heart Wheel कहा गया है।यह ब्रेस्टबोन के बीचों -बीच अवस्थित है। दोनों स्तनों के बीच इसकी अवस्थिति रहती है। कमर के पीछे इसकी अवस्थिति पहला थोरासिक वर्टिब्रा(वक्ष बांस ) है। 

इस चक्र का संबंध हमारे थाइमस (Thymus gland बाल्य ग्रंथि ),हृदय और रक्तसंचरण तंत्र से है।प्रेम यहीं  उपजता है राग- अनुराग- विराग भी। 

इसका रंग गुलाबी है। 

(५ )पांचवां Throat Chkra (कंठ चक्र ,विशुद्धि चक्र )कंठ -गढ़ा pit of throat में रहता है। इसकी अवस्थिति हमारी गर्दन के अग्रभाग में आगे की ओर  गर्दन के आधारीय भाग में रहती है। इस भाग को  होलो आफ दी कॉलर बॉन भी कहा जाता है। 

इसका सम्बन्ध थाईरॉइड ग्रंथि ,फेफड़ा (lungs )और ENT यानी ईअर -नोज़ और थ्रोट (कान -नाक -गला या कंठ  )से जोड़ा गया है। थाईरॉइड ग्रंथि का अधिक या जरूरत से कम सक्रीय रहना ही 'हाइपर' और 'हाइपो -थाइरोइड्जम 'की वजह बनता। 

हाइपर में चयअपचयन की दर के बढ़ने से भूख जल्दी -जल्दी और बहुत तेज़ लगती है व्यक्ति अधिक खाता है और फिर भी पतला होता जाता है। 

'हाइपो' में इसके विपरीत कैलोरी बर्न करने की रफ़्तार घट जाती है ,मेटाबोलिक रेट कम हो जाने से मरीज़ खाता भी कम है लेकिन फिर भी उसका वेट बढ़ जाता है। 

इस चक्र को  रंग अलॉट किया गया है -हल्का नीला (लाइट ब्ल्यू ). 

To be more precise about the Throat Chakra :


(Fifth Chakra) The Throat chakra is located in the front at the base of the neck, at the 

hollow of the collarbone, with its spiral rooted in the third cervical vertebras at the 

back, the spine at the base of the skull. This chakra corresponds to the Thyroid, 

Lungs, Ears, Nose and Throat.

(६  )छटा चक्र आज्ञा चक्र है जिसे 'थर्ड -आई- चक्र' भी कहा गया है। यह हमारी दोनों ब्रोज़ (भवों )के 

बीच

 अवस्थित है।कमर में  रीढ़ की  पहली स्रविअकल - वर्टिब्रा (ग्रीवा कशेरुक )के पास है इसकी 

अवस्थिति। 

इस चक्र का सम्बन्ध हमारे नेत्रों के अलावा पीयूष ग्रंथि (pitiuitary gland ) से भी जोड़ा गया है। 

आकार में मटर के दाने भर है ये ग्रंथि जिसे हमारे शरीर की मास्टर ग्रंथि कहा जाता है। मस्तिष्क के

 आधारीय भाग में होती है यह ग्रंथियों की भी नियामक ग्रंथि। यह खुद भी अनेक हारमोन तैयार करती 

है 

जो हमारे शरीर में चलने वाली अनेक प्रक्रियाओं को चलाये रहने में मददगार रहते हैं तथा शेष ग्रंथियों 

को भी हारमोन बनाने के 

लिए ज़रूरी उत्तेजन या उकसावा देती है। 

इसका रंग गहरा नीला या INDIGO बतलाया गया है। 

(७ )सातवां चक्र  The Crown  सब से ऊपर शीर्ष  चक्र है (सिरोपरी है )जिसकी अवस्थिति कपाल के

ऊपर सतह पर बतलाई गई है। इसे ब्रह्मरन्ध्र या सहस्रार चक्र भी कहा  गया है। 

इस ग्रंथि का संबंध Pineal gland और Pituitary gland से भी जोड़ा गया है। 
इसे पीनियल -पिंड ,एपिफीसिस -सेरीब्री या तीसरा- नेत्र भी कहा गया है। यह पृष्ठवंशी मस्तिष्क में स्थित एक लघुतर अंत :स्रावी (endocrine gland )  ग्रंथि है। 

यह सेरोटॉनिन  से पैदा मिलेटोनिन को पैदा करती है। 

यह हमारे जागने -सोने मौसमानुकूल हमसे हरकतें करने करवाने का काम  

करवाती  है। पाइन शंकु सी बित्ता भर चावल के दाने सी ,आकार की ग्रंथि है ये 

पीनियल ग्लेंड। 

हमारी खोपड़ी का एक्सरे उतारने पर यह साफ़ देखी  जा सकती है। 


पीनियल ग्लेंड :It is a small endocrine gland in the brain; situated 

beneath the back part of the corpus callosum; secretes 

melatonin

सातवें क्राउन चक्र या सहस्रार चक्र का रंग पपल या 

जामुनी (PURPLE)बतलाया गया है।बैंगनी भी कह देते हैं इस रंग को बैंजनी 

भी। 

विशेष :कुण्डलिनी शब्द के भौतिक और पारभौतिक मतलब निकाले जा सकते हैं। /कुंड' धातु (root word )से बना है यह शब्द 'कुण्डलिनी'। इस 'धातु' का शब्दिक अर्थ निकलता है 'बेसिन' या 'सोर्स'। 

इस दृष्टिकोण से सोचें तो कुण्डलिनी पृथ्वी के आदिम (पृथ्वी के भी निर्माण से पूर्व का कच्चा माल )तत्वों का मिश्र है।कुण्डलिनी देवी को आरध्या समझा गया है। ये आपको गुणात्मक रूप से ऊर्ध्वगमन भी करा सकती है अधोगमन भी याने गर्त में भी गिरा सकती है। यौन शक्ति की देवी है 'कुण्डलिनी'।यही सृष्टि का संचालन किये है।   

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

नाड़ियों का संगम स्थल हैं ये ऊर्जा घर जिन्हें हम कुंडली चक्र (ऊर्जा केंद्र )कहते हैं

यूं हमारे शरीर के संचालन के लिए हमें कुदरत ने ११४ पावर हाउस या ऊर्जा सेंटर दिए हैं बहत्तर हज़ार नाड़ियाँ

 नाड़ियों का संगम स्थल हैं ये ऊर्जा घर जिन्हें हम कुंडली चक्र (ऊर्जा केंद्र )कहते हैं ।

 यहां जो गति है उसका अभिप्राय ऊर्जा के एक से दूसरे स्तर ,एक डायमेंशन से दूसरे तक जाना है। आकार में ये एनर्जी सेंटर त्रिभुजाकार हैं लेकिन इन्हें  ही 'एनर्जी  -वील' या 'ऊर्जा - चक्र' कह दिया जाता है।

कुण्डलिनी चक्र ये ही हैं।

इनमें से दो हमारे भौतिक शरीर से बाहर रहते हैं शेष ११२ में से १०८ कार्यशील रहते हैं बाकी चार इनके सक्रिय होने पर फलीभूत होने लगते हैं। ये १०८ का आंकड़ा भौतिक विज्ञानों से लेकर अध्यात्म -विद्या तक बड़ा एहम माना गया है।

सूर्य के व्यास से पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी १०८ गुना ज्यादा है  . सूर्य का व्यास पृथ्वी  के व्यास से १०८ गुना है। पृथ्वी और चंद्र के बीच की दूरी चंद्र व्यास से १०८ गुना है। सौर -परिवार की निर्मिति में इस प्रकार इस नंबर १०८ की बड़ी भूमिका रही है हमारे शरीर के लिए भी यह संख्या इसलिए महत्वपूर्ण है। हमारी जैव -घड़ी को भी पृथ्वी की सूर्य के गिर्द गति और नर्तन ही तो चलाये हुए हैं ।

आगम -निगमों के अंतिम भाग यानी 'वेदों की क्रीम' वेदांत  के रूप में वेदों के सार तत्व के रूप में हमारे पास १०८ उपनिषद हैं। कुछ लोग तो अपना नाम ही श्री श्री श्री १००८ या १०८ श्री ... रख लेते हैं।

प्रमुखतम सात चक्रों (एनर्जी वील )में से पहला मूलाधार (root wheel )कहलाता है जो पुरुषों में अंडकोष और गुदा के बीच में ,नारियों में गुदा एवं योनि के बीच बतलाया गया है इस स्थान को पैरीनिअयम (Perineum ) या बुनियादी आधार (मूलाधार-चक्र  )कहा गया है।

दूसरा ऊर्जा घर जो प्रजनन अंगों के ठीक ऊपर रहता है 'स्वाधिष्ठान -चक्र ' कहलाया है।

नाभि के नीचे अवस्थित ऊर्जा केंद्र को 'मणिपूरक-चक्र'  कहा गया है।

'अनाहत -चक्र' पसली - पंजर(रिब केज )के नीचे  रहता है जिसे 'heart wheel' भी कह दिया जाता है 'हृद -चक्र' भी।

'अनाहत' का अर्थ है बिना आवाज़ की आवाज़ जिसे योगीजन ही सुन सकते हैं जिनका चित्त शुद्ध है मन का भांडा निर्मल  रहता है।

 'विशुद्धि -चक्र' कंठ -गढ़ा (कंठ गुठली ,pit of throat )में रहता है।

'आज्ञा -चक्र 'हमारी भवों (eye brows )के मध्य अवस्थित रहता है जिसे 'तीसरा -नेत्र' भी कह दिया जाता है।

इन सबसे ऊपर हमारे कपाल के ऊपर मैन -पावर -हाउस है जिसे 'सहस्रार-चक्र ' या 'ब्रह्मरन्ध्र' भी कहा  गया है।

नवजात शिशु के कपाल पर यह 'सॉफ्ट -स्पॉट 'के रूप में रहता है।

जब व्यक्ति शरीर छोड़ता है उसकी कपाल क्रिया की जाती है दाहसंस्कार के अंतिम चरण में। सनातन भारत धर्मी समाज एक बांस से प्रहार करता है इस स्थान पर ,कहते हैं जीवात्मा तभी शुद्ध आत्म -रूप में शरीर से सर्वथा मुक्त होता है।

एक से ज्यादा आयामों (dimensiosns)को दर्शाते हैं ये चक्र।

एक आयाम इनका भौतिक अस्तित्व है दूसरा आध्यात्मिक आयाम है।

इन्हें निम्न या उच्च ऊर्जा केंद्र कहना भ्रामक सिद्ध हो सकता है। जैसे हम किसी इमारत की नींव और उसकी छत की परस्पर तुलना नहीं कर सकते वैसी ही स्थिति यहां है। कोई किसी से हेय नहीं है सबका अपना महत्व है भले ऊर्जा का बंटवारा इनमें परस्पर  विषम रहा हो।

छत इमारत का शिखर होने से श्रेष्ठ नहीं हो जाती है। असल बात इमारत की नींव है जिस पर एक के बाद एक मंजिलें ख़ड़ी कर ली जातीं हैं।
इमारत की नींव ही उसे भूकंप -रोधी बनाती है उसकी सुरक्षा का इंतज़ाम करती है ,लम्बी उम्र भी भवन की इमारत की बुनियाद ही तय करती है।ताश के पत्तों सी गिर जातीं हैं कुछ इमारतें कुदरत की  ज़रा सी भी विषम आहट पर। भले भाषिक स्तर पर हम यही कहते समझते हैं 'छत' ऊपर है इमारत का 'शीर्ष' और 'बुनियाद' पाँव हैं जो नीचे है सबसे। 

यदि आपकी  ऊर्जा इसी मूलाधार में अपना प्रभुत्व बनाये हुए है -तब आप की सोने और खाने में ही विशेष रूचि दिखेगी।
लेकिन यही मूलाधार इन दोनों बेसिक इंस्टिंक्टस से सर्वथा मुक्त भी हो सकता है बा -शर्ते आपका चित्त शुद्ध हो चर्या नियमित, संयमित ,ज्ञानोदय के बाद की स्थिति में नींद और भूख योगीजनों को न तो सताती है न ही ज़रूरी रह जाती है। लेकिन ये सब अब गए ज़माने की बातें हैं। आज यह सब दिखना विरल से भी ज्यादा विरल है। 

इन्हीं ऊर्जा चक्रों का सूक्ष्म प्रकटीकरण- 'क्षेत्र' कहलाता है। 

'क्षेत्र' का मतलब होता है रहने की जगह। भगवद्गीता में इस शरीर को 'क्षेत्र' तथा इसे जान ने वाले 'पुरुष' (आत्मा )को 'क्षेत्रज्ञ' कहा गया है। 

'क्षेत्र' भी दो तरह के हैं 'अंतर -क्षेत्र' तथा 'बाहरी- क्षेत्र'। मसलन आप वर्तमान में इस पल में कहीं और हैं और आपका घर कहीं और है। एक अपना -घर है तो दूसरा हॉलिडे -होम है।  हॉलिडे होम में आप उल्लसित हैं नित्य कर्म तो दोनों जगह यकसां हैं लेकिन यहां जिंदगी के बाकी  तकाज़े और झमेले  कम हैं।आपको कुछ कामों से राहत है।वीकेंड की तरह आप थोड़ा सा रिलेक्स्ड हैं। 

और यदि आपका घर हिमालय पर हो तब आप एक विपुलता का एहसास लिए होंगे फिर भी अपने  घर में होना रहना आसान है। लेकिन यहां हिमालय आधारित घर में आपका ध्यान बंटाने के लिए चीज़ें बहुत कम हैं। आप संकेंद्रित रह सकते हैं ,फोकस्ड रह सकते हैं। 

कुदरत ने आपको दोनों बख्शे हैं 'अंतर्' और 'वाह्य -क्षेत्रों'  के रूप में।

आप 'अंतर् -क्षेत्र' में विश्राम कर सकते हैं आलस्य और निद्रा प्रेमी हो सकते हैं और 'बाहर के क्षेत्र' में उल्लसित।

पाबंदी कोई नहीं है आप कभी भी उल्लसित बाहरी क्षेत्र से भीतर के क्षेत्र में आ सकते हैं। 

दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान है यदि यह चक्र आपका ज्यादा सक्रीय बना हुआ है यहां ऊर्जा क्षेत्र अपना प्रभुत्व लिए है तब आप भोग विलास की ओर  भौतिक -साधनों रंग -रूप की तरफ ज्यादा आकर्षित रहेंगे। 

हर तरीके से भोगना चाहेंगे आप जीवन को। भोग के स्तर पर जीने में ही  आपको रस आएगा।  यही भोग योनि है। 

यदि आपकी ऊर्जा अपना प्रभुत्व मणिपूरक -क्षेत्र में प्रकट कर रही है तब आप एक्शन में यकीन रखेंगे। लक्ष्य टारगेट्स पर आपकी निगाह रहेगी। रजो -गुण मुखरित होगा। मल्टीटास्कर्स हो सकते हैं आप। 

और यदि आपका अनाहत -चक्र अपना प्राधान्य प्राबल्य लिए है तब आप रचनात्मकता के शिखर को छू रहें होंगे।

विशुद्धि- चक्र का प्रभुत्व आपको शक्तिमान बनाता है। 

आज्ञा -चक्र का सक्रियण आपको बुद्धिमत्ता के शिखर पर ले जाता है। प्रबुद्धता का एहसास कराता है। भूख बढ़ाता है सब कुछ को जान समझ  लेने की। ज़ज़्ब कर लेने की।  गूगल -बाबा बन जाते हैं आप। 

बौद्धिक होने का एहसास आपको शान्ति का अनुभव कराता है। आप बाहर क्या हो रहा है इसे थोड़ा भूलकर टिकाव महसूस कर सकते हैं ज़िंदगी में यदयपि प्रायोगिक तौर पर ऐसा होता नहीं है हुआ नहीं है ,बिरले ही ऐसा होना और बात है। 

सहस्रार -चक्र का प्रभुत्व यहां तक की यात्रा आपको परमानंद की अनुभूति कराती है करा सकती है अब आप शिखर को छू चुके हैं। बिला वजह आप को सुखानुभूति हो सकती है बिना किसी बाहरी उत्प्रेरण उद्दीपन  के क्योंकि ऊर्जा ने शिखर छू लिया है।  

सितारों से आगे जहां और भी हैं ,

अभी इश्क के इम्तिहान और भी हैं। 

ऐसा कहने वाला अब कोई बाकी ही नहीं है। 

आप कह सकते हैं। अहं ब्रह्मास्मि। मैं ही भगवान् हूँ ब्रह्म हूँ। मेरे बाहर कुछ नहीं है। अंदर बाहर सब जगह मैं ही हूँ। 

हालांकि प्रायोगिक तौर पर ऐसा भी हो नहीं सकता है। आप एक बड़ी मुसीबत अपनी कुंडली आधी -अधूरी जगवाकर अपने गले में ज़रूर डाल  सकते हैं।

आध्यात्मिक यात्रा 'मूलाधार' से 'सहस्रार' तक का सफर है। 

यह ऊपर हिमालय से आये पानी को उसके स्रोत तक जबरन ले जाना है। 

हिमालय से एक हिमनद पिघला है नीचे आ गया है आप जैसे एक बाँध बनाके इस जलराशि को दोबारा हिमालय पर ही ले जाना चाहते हैं। क्या यह  मुमकिन हैं। वर्तंमान परिदृश्य में तो बिलकुल नहीं। 

'कुण्डलिनी -जागरण' सैद्धांतिक तौर पर एक ऊर्जा -स्तर से दूसरे पर जाना है हमारे आध्यात्मिक उद्भव और विकास की एक श्रृंखला है -एक से दूसरे आयाम तक जाना। प्रत्येक ऊर्जा स्तर का अपना आवेग अलग है ऊर्जा की राशि अलग है। इंटेंसिटी अलग है। 

विशेष :ऊर्जा के सात - स्तर या सात -केंद्र ,सात -चक्र हैं :

मूलाधार चक्र से आज्ञा चक्र तक जाने के बहुविध आध्यात्मिक मार्ग और तरीके हो सकते हैं लेकिन यहां से यानी आज्ञा -चक्र से आगे जाने का कोई मार्ग नहीं है। यहां से आगे जाने के लिए :

One has to either jump or fall 

into a bottomless pit. This is called “falling upward.”  

In yoga, they say unless you are willing to fall upward, you won’t get there.  Fundamentally, any spiritual path can be described as a journey from the muladhara to the sahasrara This is why so many so-called spiritual people have come to the conclusion that peace is the highest possibility – because they got stuck in agna. Peace is not the highest possibility. You can become ecstatic, so ecstatic that the whole world becomes a big joke in your understanding and experience. Everything that is dead serious for everybody is just a joke for you.  People come and stop there for a long time, just to make up their mind to jump. This is why in the spiritual traditions, so much stress was always laid on the Guru-shishya relationship – the master-disciple relationship – is simply because if you have to take this jump you need deep trust in the Guru. 99.9% of the people need trust, otherwise they cannot jump. This is the reason why so much stress is laid on this relationship, because without trust, one will never take that jump.

गुरु का मतलब होता है श्रद्धा -भाव का केंद्र आपके एहम का सम्पूर्ण विसर्जन।गुरु एक विचार है गुरुग्रंथ साहब का शबद  है गुरु।  

अब ऐसे शिष्य कहाँ और 'गुरु' जाने भी दो यारों उनकी क्या बात करना ,हम अधिकारी भी तो नहीं है इसके। 

कुण्डलिनी ऊर्जा केंद्र :हमारे शरीर में कहाँ और कौन सा ऊर्जा केंद्र है ?




योग विद्या से ताल्लुक रखने वाली तमाम किताबें हमारे शरीर में ऊर्जा केंद्रों की बात करतीं हैं। ये ऊर्जा चक्र हमारे सूक्ष्म शरीर की निर्मिति करते हैं। हमारे चित्त को खुश या ग़मज़दा बनाते हैं कभी हम नाहक़ बिला -वजह ही बहुत प्रसन्न परमसन्तुष्ट दिखलाई देतें हैं और कभी उदास खुद से ही खफा -खफा तो ये सब किया धरा इन चक्रों का ही होता है जो या तो अवरुद्ध होतें हैं या अतिसक्रिय। इनकी तुलना कमल पुष्प और उसकी पंखुड़ियों से की गई है।

ये ही हमारे हाव -भावों ,अनुभावों ,मनोभावों की चाबी हैं लगाम हैं। हमारे शरीर के अंगों पर काबू या नियंत्रण ये ही चक्र रखते हैं। ये ही विभिन्न अंगों के समन्वयकर्ता कोऑर्डिनेटर हैं। समस्वरता समरसता सामंजस्य या फिर विषमस्वर असहमति यही रचते हैं।इनके असर से कमोबेश  हम सब वाकिफ हैं। ध्यान या योग की क्रिया करने वाले कुछ ज्यादा सामान्य आदमी थोड़ा सा कम.

सिरदर्द हो या बदन दर्द ,अवसाद हो या चिड़चिड़ापन या  खिन्नता हाथ पैरों का स्वयं चालित संचालन इन्हीं ऊर्जा केंद्रों के पार्श्व प्रभाव के रूप में देखे समझे जा सकते हैं।

यहां तक की सांस की लयताल ,या फिर बे -तरतीबी से साँसों का चलना इनकी ही सौगातें हैं।

बाकायदा स्पेक्ट्रम के रंगों की तरह इनके नाम और वर्ण हैं । ये संसार नाम और रूप की ही सृष्टि है। हर चीज़ का एक नाम है।इनके भी नाम और वर्ण हैं ,इनमें से सात ऊर्जा केंद्र चर्चित रहे हैं :

(१ )लाल रंगी मूलाधार (Basal Or root wheel )

(२ )  नारंगी या ऑरेंज स्वाधिष्ठान चक्र (Sacral wheel )

(३  )पीतवर्णी या पीला मणिपुर या मणिपूरक (Solar plexus ,स्नायु गुच्छ ,सौर -जाल )

(४ )हरा वर्ण लिए अनाहत या हृद चक्र (Heart wheel )

(५  )नीले रंग वाला कंठ चक्र या विशुद्ध चक्र (Throat wheel )

(६ )नील के पौधे जैसा नील -वर्णी आज्ञा चक्र (Brow wheel )

(७ )बैंगनी सहस्रार चक्र (Crown wheel )

इनमें से प्रत्येक की अवस्थिति और काम निर्धारित है जैसे ये किसी एक शहर  के सात मोहल्ले हों ,कॉलोनियां हों :

(१ )मूलाधार चक्र :यह गुदा और लिंग के बीच पैरीनियम (Perineum )कहीं पुरुषों में और गुदा और  योनी  के बीच कहीं महिलाओं में अवस्थित रहता है। सुप्तावस्था में यही स्त्रीलिंगी कुंडलिनी -शक्ति ,विपुल -ऊर्जा यहां पड़ी हुई है। इसे ही भुजंगिनी ,ईश्वरी ,नादशक्ति भी कहा गया है। संसार से यही मूलाधार हमें जोड़ता है। हमारी वासनाओं का केंद्र यही है। जब तक वासनाएं शेष हैं इनकी पूर्ती के लिए जीवन मरण चलता रहेगा। 

लोगों को बहकाया जाता है तुम ही शिव हो ,कुण्डलिनी जागने की देर है ईश्वर वीश्वर कुछ नहीं हैं अनीश्वर -वाद का पोषक है कुंडली जागरण का दावा करने वाला धंधेबाज़। क्योंकि  ऐसे कितने लोग हैं आज जो वीत -राग है निरमोहा हैं ,जीवन और जगत से जिनका कोई अब लेना देना ही नहीं हैं जिनकी हर प्रकार की वासना चुक गई है।इसलिए इनके झांसे में न आइये। 

मूलाधार को उठाके सहस्रार तक पहुंचा देना है कथित कुण्डलिनी जागरण।जो आपको विक्षिप्तत अवस्था  में ले जा सकता है क्योंकि आज न वह अनुशासन है न अनुशासित गुरू।  

(२ ) स्वाधिष्ठान चक्र त्रिक (कमर के पीछे की तिकोनी हड्डी )में हमारे प्रजनन अंग के ठीक ऊपर अवस्थित है। यौन सुख ,सुखाभास ,हमारे मनोरंजन और विलास  का केंद्र यही है। 

(३ )मणिपूरक चक्र (solar plexus )नाभि के थोड़ा नीचे रहता है। हमारा आत्मबल आत्मविश्वास अपने आसपास को प्रभावित  करने की कूवत इसी ऊर्जा सोते में है। 

(४ )अनाहत या (Heart Chakra )हमारी छाती के मध्यप्रदेश में वहां है जहां पसली -पंजर आकर मिलती है। छाती की हड्डी आ मिलती है। यहीं उमगता है प्रेम 'लव अट फस्ट साइट' ,हमारे रागात्मक संबंधों का ऊर्जा केंद्र यही है। 

(५ )विशुद्धि चक्र (कंठ गह्वर Pit of the throat )में अवस्थित है इसीलिए इसे कंठ चक्र भी कह समझ सकते हैं। अभिव्यक्ति का माध्यम यही बनता है। वाक्पटुता ,वाग्मिता इसी से है। कम्युनिकेशन स्किल्स इसी से है। 

(६ )आज्ञा चक्र (ज्ञान चक्षु Third eye wheel )भवों (eye brows )के बीचोंबीच बतलाया गया है। इसे ही तीसरा नेत्र भी कहा  गया है। महिलाओं का सिक्थ सेन्स यहीं हैं। सहज बुद्धि ,सहजबोध ,बुद्धिमत्ता का संचालन यहीं से होता है यही है कंट्रोल रूम इंटेलिजेंस का। 

(७ )सहस्रार चक्र या ब्रह्मरन्ध्र (It is at the top of the head ),प्रसव के समय नवजात के सिर पर (कंकाल या कपाट पर )एक सॉफ्ट स्पॉट देखा जा सकता है। यही है सहस्रार चक्र केंद्र। जो सभी केंद्रों का मास्टर केंद्र है। ज्ञानोदय ,आध्यात्मिक संचेतना ,आत्मबोध यहीं पैदा होता है। 

(शेष अगले अंक में ...  )

कुण्डलिनी ऊर्जा केंद्र :हमारे शरीर में कहाँ और कौन सा ऊर्जा केंद्र है ?

कुण्डलिनी क्या है ?


कुण्डलिनी क्या है ?

कुण्डलिनी एक प्रकार की सचेतन ऊर्जा है जिसके मुख्यतौर पर हमारे शरीर में सात केंद्र हैं जो नियमित अपना -अपना काम करते हैं। मूलाधार इसका पहला तथा सहस्रधार या ब्रह्मरन्ध्र सातवां शारीरिक ऊर्जा  केंद्र है । हालांकि इन सबकी ऊर्जा का सोता हमारा मस्तिष्क ही है लेकिन इनका स्पंदन अपनी -अपनी निर्धारित जगहों से ही होता है।जहां से ये हमारे शरीर के स्रावी तंत्र को चलाये रहते हैं ,हमारे भावानुभाव ,राग -विराग ,हमारी बुद्धिमत्ता का भी संचालन करते हैं। मसलन मूलाधार हमारी तमाम तरह की वासनाओं (इच्छाओं )का केंद्र है यही हमें बाहरी जीवन और जगत से जोड़ता है। सृष्टि की निरंतरता यौन कर्म का संचालन विनियमन यही करता है। 
यूं हज़ारों हज़ार   ऊर्जा चक्र हैं हमारे शरीर में  लेकिन जैसे १०८ उपनिषद मान लिये गए हैं और उनमें से भी ग्यारह प्रमुख उपनिषद जानकारों ने बतलाये हैं जिनके भाष्य आदिगुरु शंकराचार्य ने लिखें हैं ऐसे ही ११४ ऊर्जा चक्र जानकारों ने बतलाये हैं इनके अलावा  भी अनेक और ऊर्जा चक्र  हैं लेकिन ११४ ऊर्जा चक्रों को ही प्रमुख मान लिया गया है। इनमें से भी प्रमुख्तार सात को मान लिया गया अहइ जिनकी चर्चा हम इस आलेख की आगे की किस्तों  में करेंगे। 
हमारे शरीर में ऋषिमुनियों ने ७२ ,००० नाड़ियाँ बतलाईं  हैं। ये ऊर्जा सरिताएं या चैनल हैं जिनसे होकर संजीवनी ऊर्जा या प्राण (Vital energy )पूरी काया में  आवाजाही करते हैं पूरे शरीर को अनुप्राणित करते हैं। एक पेचीला ऊर्जा -तंत्र या ऊर्जा- रूप है हमारा शरीर। 

हमारी काया के अनेकस्थलों या बिंदुओं पर ये नाड़ियाँ आकर मिलती हैं जंक्शन पर जैसे ट्रेनें आती हैं फिर आगे बढ़ जातीं   हैं। ये मिलनबिंदु त्रिभुज बनाते हैं। इन्हें ही चक्र या चक्का ा(वील )कह दिया जाता है। इनमें कुछ केंद्रों के पास ज्यादा सत्ता निहित रहती है शेष के पास इससे कमतर ही ऊर्जा शक्ति रहती है। अलबत्ता हमारे सारे गुणदोषों के जन्मदाता माई -बाप यही केंद्र बने रहते। 

इन दिनों बरसाती मेढकों की तरह गली -गली ऐसे गुरु निकल आएं हैं जो अपने को भगवान्  बतलाते हैं। आपको भी ब्रह्मज्ञानी (आत्मज्ञानी )बना देने का दावा पेश करते हैं। कुंडलिनी जागरण केंद्र चलाते हैं जबकि न इन्हें   'कुण्डलिनी' शब्द का अर्थ पता  है और न ही 'कुण्डलिनी -जागरण' के निहितार्थ। 

एक मोटे उदाहरण से अपनी बात समझाने की कोशिश करते हैं। हिमालय के किसी हिमनद या ग्लेशियर से निकल जलधारा अधोगामी रुख कर लेती है ,जल का प्रवाह अधिक से कमतर दाब की ओर  रहता  है। अधिक पोटेंशिअल एनर्जी से लोवर की ओर  ऊपर से नीचे के जल स्तर की ओर   स्वत : स्फूर्त ही रहता है। कुण्डलिनी जागरण का  मतलब है पहले तो बाँध बनाकर इस पानी को रोका जाये। फिर लगातार इसका स्तर ऊंचा उठाया जाए और दोबारा इसे हिमालय पर ही ले जाया जाए। 
इनको भले मानुषों को ये नहीं मालूम मस्तिष्क में तो पहले ही दुनिया भर का कचरा बाहरी सूचनाएं एक से एक आला विचार सरणियाँ प्रवाहित हैं वह कैसे इस अकूत पोटेंशिअल एनर्जी को संभालेगा।उत्पात मचा देगा हमारा मस्तिष्क। मेनियाक हो जायेंगे हम लोग।क्योंकि कुण्डलिनी जागरण से पहले शिष्य वीत -राग होना चाहिए और गुरु ब्रह्म -ग्यानी। न शिष्य के दिमाग में इंटरनेट या पोर्न होना चाहिए न होटल और रेस्त्रां न स्टार्टर्स न मेनकोर्स। 

 कहने की जरूरत नहीं है ये स्वयं -भू (स्वयं घोषित गुरु -'गुरु घंटाल' हैं जो अपनी अनुकृति बनाके आपको पेश करने का दावा करते हैं।कैसे ये जान ने के लिए आगामी किस्तों का इंतज़ार हमें भी रहेगा आपके साथ। 

सन्दर्भ -सामिग्री :https://www.huffingtonpost.com/sadhguru/the-7-chakras-and-their-s_b_844268.html   

(ज़ारी )

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

इंदिराजी इंद्रा -व्यवस्था की मारफत यही सन्देश दे रही थीं कौवों की कांव -कांव ही संगीत होता है। संगीत -फंगीत इसके अलावा और कुछ नहीं होता। गौरैयाओं को यही कहा था -तुम खाओ पीयो बस इतना बहुत है तुम्हारे लिए इस देश की चिंता तुम मत करना। सुप्रीम कोर्ट भी अब उसे ही दिन कहेगा जिसे हम दिन कहना चाहेंगे और कहते हैं।

बहुत  नहीं सिर्फ  चार कौवे थे काले ,उन्होंने ये तय किया कि सारे उड़ने वाले ,

उनके ढंग से उड़ें ,रुकें ,खाएं और गायें ,वे जिसको  त्यौहार कहें सब उसे मनायें  .

कभी -कभी जादू हो जाता  दुनिया में ,दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया  में ,

ये औगुनिये चार बड़े सरताज हो गये  ,इनके नौकर चील गरुण और बाज़ हो गए।

हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में ,हाथ बाँध कर खड़े हो गए सब विनती में ,

हुक्म हुआ चातक पंछी रट  नहीं लगाएं ,पिऊ -पिऊ को छोड़ कांव -कांव ही गाएँ।

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को ,खाना पीना मौज़ उड़ाना छुटभैयों को ,

कौओं की ऐसी बन आई पाँचों घी में ,बड़े बड़े मनसूबे आये उनके जी में।

उड़ने तक के नियम बदल कर  ऐसे ढाले ,उड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले।

आगे क्या हुआ सुनाना बहुत कठिन है ,यह दिन कवि  का नहीं चार कौओं का दिन है ,

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना ,लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह  सुनाना।

                          -----------------------  (भवानी प्रसाद मिश्र )

कविता -संग्रह ' जी हाँ मैं गीत बेचता हूँ किस्म -किस्म के गीत बेचता हूँ। ' से साभार।

                               ----------------------------------(भवानी प्रसाद मिश्र )
प्रस्तुति :वीरेंद्र शर्मा (वीरु भाई )

भावसार :भवानी भाई की ये कविता आपातकाल में तब लिखी गई थी जब इस देश की तमाम संविधानिक व्यवस्थाओं  के ऊपर एक इंद्रा -जी  पालती मारकर  बैठ गईं थीं।महज़ अपनी कुर्सी बचाने के लिए इलाहाबाद उच्चन्यायालय के फैसले को धता बताते हुए तब उन्होंने जो सन्देश दिया था भारत के जन-मन को उसका खुलासा यह कविता बेलाग होकर करती है। यह वह दौर था जब  तमाम छद्म मेधा उनकी हाँ में हाँ भयातुर होकर मिलाने लगी  थी। लेकिन उस दौर में भी दुष्यंत कुमार और भवानी दा जैसे लोग थे जिन्होंने अपनी अस्मिता को बचाके रखा था और ये कविता दागी थी उस समय की दुर्दशा से संतप्त होकर:

इंदिराजी इंद्रा -व्यवस्था की  मारफत यही सन्देश दे रही थीं कौवों की कांव -कांव ही संगीत होता है। संगीत -फंगीत इसके अलावा और कुछ नहीं होता।
गौरैयाओं को यही कहा था -तुम खाओ पीयो बस इतना बहुत है तुम्हारे लिए इस देश की चिंता तुम मत करना। सुप्रीम कोर्ट भी अब उसे ही दिन कहेगा जिसे हम दिन कहना चाहेंगे और कहते हैं।

ये वो लोग थे जो यह कहते समझते थे -जब हम पैदा हुए थे तभी से इस सृष्टि का निर्माण हुआ है । उस व्यववस्था के ध्वंश अवशेष आज भी अपने बेटे का नाम प्रभात रखके ये समझते हैं हमने सूरज को पाल लिया है। वह भी तभी निकलेगा जब हम चाहेंगे।

इसी इंद्रावी तंत्र के कुछ अवशेष और चंद कट्टर पंथियों की गोद  में पोषण पाते हमारे रक्तरँगी लेफ्टिए आज मोदी को फूंटी आँख नहीं देख पा रहे हैं। जानते हैं किसलिए :

वह इसलिए अब सूरज नियमानुसार उदित हो रहा है किसी का पालतू नहीं है। 

रविवार, 15 अक्तूबर 2017

राम भगवान् हैं ,सीता जी भक्ति हैं ,भक्त हनुमान हैं। सीताजी शान्ति का भी प्रतीक हैं।

शिखर से शून्य तक की यात्रा 

मरणासन्न रावण लक्ष्मण  के प्रश्नों का उत्तर देते हुए  सीख देता है :

(१)इच्छाओं की पूर्ती से इच्छाओं का अंत नहीं होता ,इच्छाएं और बढ़ जाती हैं ,इच्छाओं का रूपांतरण करना पड़ता है मैं यहीं चूक गया। 

(२)शुभ काम के करने में कभी देरी नहीं करनी चाहिए और अशुभ के करने में जल्दी। 

(३ )अपने शत्रु की क्षमताओं को कभी भी अपने से कम आंक के नहीं देखना ये मेरी तीसरी भूल थी मैं इसी गुमान में रहा एक वनवासी वानर ,एक मनुष्य मेरा क्या मुकाबला करेगा। यह रावण की लक्ष्मण  को तीसरी सीख थी। 

(४ )कभी अपने जीवन की गुप्त बातों को किसी के सामने प्रकट न करना मैंने एक बार यह गलती की थी विभीषण को अपनी मृत्यु का राज बतला दिया था ,जिसका खामियाज़ा अब मैं भुगत रहा हूँ। 

'हम काहू के मरहि न मारे ,
वानर मनुज जाति दुइ मारे। '-यही वर माँगा था रावण ने शिवजी से ,ब्रह्मा जी से ,रावण तप और तपस्या दोनों के फलितार्थ का दुरूपयोग करता है। 
रावण नीति थी संस्कृति को नष्ट करना सरस्वती को हासिल करके। मेधा के दुरुपयोग  की शुरुआत ही रावण नीति थी।हमारे लेफ्टिए इसका साक्षात प्रमाण हैं।  

रावण ने  पहले तप करके अनेक वरदान अर्जित किये ,फिर उनका गलत प्रयोग करके शाप कमाए। 

जो खुद रोये और दूसरों को भी रुलाये वही रावण है। 'राव' से रावण। 

जो अपनी पुत्र -वधु को न  छोड़े उसका नाम रावण है। 

नल कुबेर का शाप था जिसकी वजह से  रावण ने  सीता के अपहरण  के बाद उनका स्पर्श नहीं किया।पर नारी का उसकी  सहमति के बिना उसका मस्तिष्क सौ टुकड़ा हो जाता।  
जो अपनी बहन को विधवा बना दे उसका नाम रावण है। 

महत्वकांक्षी रावण का कोई सम्बन्धी नहीं होता। बस एक महत्वकाँक्षा की आपूर्ति ही उसका लक्ष्य होता है। रिश्ते उसके लिए बोझ थे जिनका उसने बहुत दुरूपयोग किया।यहां तक की पार्वती को हासिल करने की उसने कुचेष्टा की।  
सेटिंग और दलाली ही रावण वृत्ति है रावण की सौगातें हैं। संतानें हैं। बलवान दिखे तो उससे माफ़ी मांग लो कमज़ोर दिखे तो उसे जीत लो। यही रावण वृत्ति थी।बाली उसे छ:  तक अपनी कांख में दबाये रहा। उससे माफ़ी मांग बाहर आकर डींग हांकने लगा।  
दो कुंठाएं भी थीं रावण की -कोई भी सुन्दर स्त्री उस पर मोहित नहीं होती थी। बस वह उठाकर ज़रूर ले आता था सौंदर्य को। दस सिर वाला काला-कलूटा रावण - सौंदर्य उसका क्या करे। 
रावण भीड़ का नेता था। भगवान्  समूह बनाते हैं। भीड़ के कोई सिद्धांत नहीं होते ,भीड़ का कोई चेहरा भी नहीं होता। राम समूह बनाते हैं वह भी स्थानीय तौर पर उपलब्ध मानव संशाधनों का। 

मानस की यह सीख है :प्रकृति और परमात्मा का कभी अपमान नहीं करना ,हम आज अशांत इसीलिए हैं भगवान् की जो प्रकृति अभिव्यक्ति है,भगवान् की जो शक्ल है  उसी प्रकृति  के साथ हम खिलावड़ कर रहें हैं। कहीं पेड़ काट रहें  हैं कहीं खदानों को डाइनेमाइट लगाकर उड़ाते हैं।

राम भगवान् हैं ,सीता जी भक्ति हैं ,भक्त हनुमान हैं। 

सीताजी शान्ति का भी प्रतीक हैं। 
रावण शान्ति भंग करता है। 
राम संस्कृति की रक्षा के लिए आये थे एक सीता को रावण से मुक्त कराने के माध्यम से वह सारे संसार की  पीड़ित महिलाओं के अनुरक्षण के लिए आये थे -जब -जब भी किसी महिला का अपहरण होगा राम आयेंगे।
आज जहां -जहां वैष्णव तरीके से जीने वाले पति -पत्नी में तनाव है ,वहां उसकी वजहें आपसी समझ का अभाव है क्योंकि पढ़े लिखे लोगों के बीच में विमत का रहना लाज़िमी है और इसमें बुरा भी कुछ नहीं है ,अब परिवार चलेगा तो समझ से ही चलेगा। एक दूसरे की कमज़ोरियों के प्रति सहनशील होने से ही चलेगा। आज विवाह दो पॅकेजिज़ दो बैलेंसशीट्स के बीच गिरह गांठ है। विवाहेतर संबंध भी सामने आ रहे हैं दोनों के ,पति के भी पत्नी के भी। अरूप रावण दोनों में विद्यमान है। 

हालांकि घर में पैसा इफरात से है लेकिन सुख शान्ति नहीं है। समाधान क्या है ?

समाधान :अन्न का नियंत्रण अन्नपूर्णा को अपने हाथ में लेना पड़ेगा। खाना अपने हाथ का बनाके खिलाना पड़ेगा पति को। मन में प्रेम भाव रखते हुए पकाना पड़ेगा। इस अन्न से ही एक प्रेम संसिक्त मन बनेगा। 
रावण ने घरों के अन्न पर भी प्रहार किया है (प्रहार किया था )-खाना तो घर का बना खाइये भले आप के पास प्रतिमाह लाखों के पैकिज़िज़ हैं। 

हनुमान (भक्ति )यदि आपके हृदय में है तो आप अंदर के अरूप रावण से जीत जायेंगे,यकीन मानिये। 
जीवन प्रबंधन की दीक्षा है रामचरित मानस में ,हनुमान चालीसा में जिसका पाठ तीन से पांच मिनिट में संपन्न हो जाता है। हनुमान समस्याओं के समाधान के हनू -मान हैं। असंभव को सम्भव बनाते हैं हनुमान। हनुमान चालीसा के तीरों से मारा जाएगा अरूप रावण। 
जीवन एक नियम का नाम है परिवार के नियम ,समाज के नियम ,जो इन नियमों को तोड़ता है वह रावण तत्व का पोषण करता है। रावण अपनी योग्यता का दुरूपयोग करता है। मातृशक्ति का अपमान करता है। 
अच्छाई जहां कहीं भी हो स्वीकार कर लेना अपना लेना । बुराई अपनी जब भी दिखे स्वीकार कर लेना। हम रावण से अपने बचपन, जवानी और बुढ़ापे को बचाएं। 

ज्ञान की अति रावण को बर्बाद कर गई थी। आज नौनिहालों को इंटरनेट की अति से भी बचाने की जरूरत है। 

आज बच्चा पैदा होते ही उस नर्स को घूरने  लगता है जो कान से मोबाइल लगाए हुए है।  नर्स कहती है विस्मय से क्यों रे छुटके क्यों घूर रहा है मुझको।ज़वाब मिलता है ज़रा अपना मोबाइल दीजिए -भगवान्  को एसएमएस करना है मैं ठीक ठाक पहुँच गया।  
सन्दर्भ -सामिग्री :

https://www.youtube.com/watch?v=Js0B_JpEAgQ

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

इन दिनों ये हालात हैं मेरे भारत के :कहीं से किसी इमारत की कोई ईंट दरक जाए ,वहां से पांच मोदी बेटर्स- निकलते हैं।

इन दिनों ये हालात हैं मेरे भारत के  

(१ )कहीं से किसी इमारत की कोई ईंट दरक जाए ,वहां से पांच मोदी बेटर्स- निकलते हैं। 

(२ )कहीं आंधी अंधड़ से भी किसी घौंसले से कोई चिड़िया का अंडा गिरके टूट जाए ,कुछ सेकुलर किस्म के प्राणि कहने लगते हैं ,इसके पीछे अमितशाह और मोदी का हाथ है। 
(३ )'सरकार ने जीना हराम कर दिया है' -एक साहब बुदबुदा रहे थे मेरे दफ्तर को लिखकर सरकार को मेरी उठ -बैठ संबंधी आरटीआई मांगने की क्यों जरूरत है ?मैंने सरकार का क्या बिगाड़ा है ?इन्हें लगता है सरकार इनके पीछे पड़ी है ,इन्हें कोई बड़ी सज़ा होने वाली है। कई तो मेरे घर -दफ्तर के लोग भी इस षड्यंत्र में शामिल दीखते है। 

 अपने आप को बड़ा महान आदमी मान ने लगें हैं ये साहब ,अपने महान होने का भरम फीलिंग आफ ग्रान्डियासिटी पाले बैठे हैं ये ज़नाब । इन्हें नहीं मालूम यह 'शिजोफ्रेनिक- बिहेवियर 'और 'बाइपोलर -इलनेस' की उत्तेजन वाली अवस्था का एक ख़ास लक्षण है। लिटमस पेपर टेस्ट है।
(४ )इधर एक शहज़ादा अखिल भारतीय  देवदर्शन यात्रा पर निकल चुका है एक दिन में पांच- पांच  मंदिरों में भगवान् के आगे जाकर इस सरकार का रोना रो रहा है। 
(५ )पूर्व में इनके कई पालतू पाकिस्तान जाकर यही रोना रो आये थे। मोदी हटाओ हमें लाओ। 

https://www.youtube.com/watch?v=2RzdnlVzAgA

इन दिनों ये हालत है इंडिआ की :एक शहज़ादा अखिल भारतीय देवदर्शन यात्रा पर निकल चुका है एक दिन में पूर्व में इनके कई पालतू पाकिस्तान जाकर यही रोना रो आये थे। मोदी हटाओ हमें लाओ। पांच- पांच मंदिरों में भगवान् के आगे जाकर इस सरकार का रोना रो रहा है।

इन दिनों ये हालत है इंडिआ की 

(१ )कहीं से किसी इमारत की कोई ईंट दरक जाए ,वहां से पांच मोदी बेटर्स- निकलते हैं। 

(२ )कहीं आंधी अंधड़ से भी किसी घौंसले से कोई चिड़िया का अंडा गिरके टूट जाए ,कुछ सेकुलर किस्म के प्राणि कहने लगते हैं ,इसके पीछे अमितशाह और मोदी का हाथ है। 
(३ )'सरकार ने जीना हराम कर दिया है' -एक साहब बुदबुदा रहे थे मेरे दफ्तर को लिखकर सरकार को मेरी उठ -बैठ संबंधी आरटीआई मांगने की क्यों जरूरत है ?मैंने सरकार का क्या बिगाड़ा है ?इन्हें लगता है सरकार इनके पीछे पड़ी है ,इन्हें कोई बड़ी सज़ा होने वाली है। कई तो मेरे घर -दफ्तर के लोग भी इस षड्यंत्र में शामिल दीखते है। 

 अपने आप को बड़ा महान आदमी मान ने लगें हैं ये साहब ,अपने महान होने का भरम फीलिंग आफ ग्रान्डियासिटी पाले बैठे हैं ये ज़नाब । इन्हें नहीं मालूम यह 'शिजोफ्रेनिक- बिहेवियर 'और 'बाइपोलर -इलनेस' की उत्तेजन वाली अवस्था का एक ख़ास लक्षण है। लिटमस पेपर टेस्ट है।
(४ )इधर एक शहज़ादा अखिल भारतीय  देवदर्शन यात्रा पर निकल चुका है एक दिन में पांच- पांच  मंदिरों में भगवान् के आगे जाकर इस सरकार का रोना रो रहा है। 
(५ )पूर्व में इनके कई पालतू पाकिस्तान जाकर यही रोना रो आये थे। मोदी हटाओ हमें लाओ। 

https://www.youtube.com/watch?v=2RzdnlVzAgA

गुरुवार, 12 अक्तूबर 2017

जहां सुमति तहाँ संपत (संपति ) नाना , जहां कुमति तहाँ विपत निदाना .

शुक्रिया शुक्रिया शुक्रिया डॉक्टर सतीश त्यागी जी 

आपने हमें  प्रस्तुत पोस्ट का कच्चा माल पकड़ा दिया।

बिलकुल सही निष्कर्ष निकाला है चेताया है इस मंदमति को -

"ये जीजू को मरवाएगा" 

इसमें एक कमज़ोरी अंग्रेजी भाषा की भी रही है -'जहां ब्रदर -इन -ला 'संज्ञा और सम्बोधन दोनों से ही यह पता नहीं

चलता कि जीजा कौन है और साला कौन है। इसलिए हिंदी भाषा ने -तमाम जीजाओं ने -बड़ी चालाकी से सालिग्राम

(साले साहिब अर्थात )

'आधे- मालिक' हमारे ये भी हैं कहकर तमाम सालों का परिचय करवाना कब का शुरू कर दिया था। ).हिंदी भाषा में कई

जगह ध्वनित अर्थ साले का गाली भी निकाला जाता है। खासकर जब हम किसी को चुनौती देते हुए देख लेने की धमक

देते हैं -कहते हुए साले तुझे तो देख लूंगा।

अब इस वंशीय राजकुमार के यहां तो परम्परा से संबंधों का मतलब जैविक -संबंध ही रहा है। इसीलिए एक मर्तबा इनकी

बहिना के लिए अपने एक सम्बोधन में  नरेंद्र मोदी ने  कहा -वह तो मेरी बेटी समान है ,बेटी ही है तो अगले दिन इनका

रिजॉइंडर चला आया -मेरे पिताजी तो राजीव गांधी थे मैं किसी की बेटी फेटी नहीं हूँ।

यहां ज़नाब सतीश त्यागी जी 

रागात्मक संबंधों के लिए गुंजाइश ही नहीं है। 

राहुल अपनी कुशाग्र -बुद्धि से जानते हैं 'साला' एक गाली है। इसीलिए हो सकता है वह अपने को वाड्रा का साला मानने

में  हीनता  अनुभव करते हों।

बहरसूरत सब जानते हैं कांग्रेस ने अमित शाह को गुजरात में कितना तंग किया था ,कैसे -कैसे आरोप पत्र मढ़े -गढ़े  थे। अमित शाह तो साफ़ बच गए क्योंकि उनके खिलाफ कुछ प्रमाणित न हो सका।

 लेकिन वाड्रा मारा जाएगा ,उसके ठंडे बस्ते में पड़े मामले में अब तेज़ी आएगी। 

अमित शाह के पुत्र के खिलाफ आरोप मढ़ने वाले भी अब बैकफुट पे आये दीख रहे हैं ,बचावी भूमिका में आ गए हैं "रेलवे मंत्री को उनका बचाव नहीं करना चाहिए था "कह रहें हैं।

हमारा मानना है ,जांच से जो सामने आये सो आये ,जांच चले खूब चले ,चिंता किसे है ,ये बात ये मंदमति समझ ले तो उचक -उचक बोलने से कमसे कम इस मामले में तो बाज़ आये। वरना इसका तो जो बिगड़ेगा सो बिगड़ेगा जीजू ज़रूर मारा जाएगा।


आखिर में एक शैर इस मंद मति के नाम (भगवान् इन्हें सुमति प्रदान करे ):

एक ग़ज़ल कुछ ऐसी हो ,

बिलकुल तेरे जैसी हो ,

मेरा चाहे जो भी हो,

 तेरी ऐसी -तैसी हो।  

तुलसीदास मानस में कहते हैं :

जहां सुमति तहाँ संपत (संपति ) नाना ,

जहां कुमति तहाँ विपत निदाना  . 

आत्मा तो स्वयं: भू संरक्षित तत्व है ही।इसका 'होना 'इज़्नेस शाश्वत है। जब इसे एक शरीर और उसके साथ एक सूक्ष्म शरीर चतुष्टय -मन -बुद्धि -चित्त-अहंकार मिल जाता है यह जीव -आत्मा कहलाने लगता है जो आत्मा से अलग नहीं है। समष्टि के स्तर पर इसे ही ब्रह्म (परमात्मा )कहा गया है। माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म ,माया से आच्छादित ब्रह्म को ही ईश्वर कहा गया है। जीवन का आधार यही आत्म चेतना है जो सभी प्राणियों के जीवन का आधार है। जड़ में चेतना का संसार इसी आत्मतत्व से होता है।

न प्रारेण नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन|  

इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितो | | (कठोपनिषद ,द्वितीय अध्याय दूसरी वल्ली ,पांचवां श्लोक)

भावसार :इस सृष्टि में ब्रह्म ही एकमात्र चेतन शक्ति है ,जो वनस्पति ,जीव -जंतु ,पशु -पक्षी व सभी मनुष्यों के जीवन का आधार और कारण है। इसी शक्ति से ये सभी जीवन पाते हैं ,वृद्धि करते हैं तथा क्रिया करते हैं।

दूसरा तत्व जड़ है जिसकी सभी क्रियाएं इस चेतन तत्व के कारण ही होतीं हैं। (प्रकृति स्वयं जड़ है ,ब्रह्म की ही एक शक्ति -'माया शक्ति' है जिसका ब्रह्म से संयोग होने पर ही यह प्रकृति बनके प्रकटित होती है। ).

मनुष्य के जीवन का आधार भी यही आत्मतत्व है। प्राण एवं अपान  भी इसी के आश्रय में अपनी क्रिया करते हैं। दूसरा तत्व जड़ है जो हमारा पंचभौतिक शरीर है।

जब यह आत्मतत्व शरीर से अलग हो जाता है तो प्राण भी अपनी क्रिया बंद कर देता है जिससे मनुष्य मर जाता है। लेकिन इस क्रिया में न जड़ (शरीर )मरता है न चेतन  आत्मा। बल्कि दोनों का संबंध विच्छेद हो जाता है। (आत्मा तो अजर -अमर -अविनाशी चेतन तत्व कहा गया है और यह पांच तत्वों का पुतला ऊर्जा का पुंजमात्र विखंडित होकर अपने मूल तत्वों -आकाश -वायु -अग्नि -जल -पृथ्वी में विलीन हो जाता है। ऊर्जा का संरक्षण हो जाता है।

आत्मा तो स्वयं: भू संरक्षित तत्व है ही।इसका 'होना 'इज़्नेस शाश्वत  है। जब इसे एक शरीर और उसके साथ एक सूक्ष्म शरीर चतुष्टय -मन -बुद्धि -चित्त-अहंकार मिल जाता है  यह जीव -आत्मा कहलाने लगता है जो आत्मा से अलग नहीं है।

समष्टि के स्तर पर इसे ही ब्रह्म (परमात्मा )कहा गया है। माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म ,माया से आच्छादित ब्रह्म को ही ईश्वर कहा गया  है।

जीवन का आधार यही आत्म चेतना है जो सभी प्राणियों के जीवन का आधार है। जड़ में चेतना का संसार इसी आत्मतत्व से होता है। 

https://www.youtube.com/watch?v=6dNAG38cveI 

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

क्या हैं गुजरात हाईकोर्ट के गोधरा फैसले के निहितार्थ ?क्यों सांप सूंघ गया है मीडिया को ?

क्या हैं गुजरात हाईकोर्ट के गोधरा फैसले के निहितार्थ ?क्यों सांप सूंघ गया है मीडिया को ?

भाजपा -नीत सरकार के सत्ता में आते ही इंतहापसन्द मुसलमान जो कांग्रेस राज में परितुष्ट रखे जाते थे जिनका हिन्दुस्तान की सम्पत्ति पर पहला हक़ जतलाया दोहराया  जाता था - जिस तरह मुंह खोलकर बोलता रहा है ,वामपंथी कहीं से
एक कन्हैयाँ पकड़ लाये ,उससे पहले रोहित वोमिला के दुखद अंत की वजह बने वह सिलसिला अभी रुका नहीं है।

परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं ,

हवा में सनसनी घोले हुए हैं।

वर्तमान कांग्रेस -वामपंथ पोषित  जेहादी सोच के लोगों का हिन्दुस्तान पर बढ़ता शिकंजा और पंजे की शै के  मद्दे नज़र हमें उल्लेखित पंक्तियाँ अनायास याद हो आईं गोधरा के फ़ांसीयाफ्ता मुजरिमों को गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा  मिली राहत पर -

सकल जगत में खालसा पंथ गाजे ,जगे धर्म हिन्दू सकल भंड भाजे।

भावसार : सारी  कुरीतियां मिट जाएँ ,खालसा पंथ जागे -सम्भल जाएँ सनातन धर्मी समाज को तिरछी निगाह से देखने  वाले। यही सन्देश था गुरुगोविंद सिंह का खालसा पंथ की नींव रखते वक्त।औरंगजेबी सोच को फतहनामा था ये पंक्तियाँ।
लेकिन कांग्रेस के इरादे आज़ादी के पहले से ही कुछ और चले आये हैं :

१९२५ में कांग्रेस ने खालसा पंथ को एक अलग  धर्म का दर्ज़ा देकर एक तरह से सनातन धर्म के व्यापक स्वरूप में तोड़ फोड़ की ,मानव कृत विखंडन की शुरुआत  थी ये साजिश थी ।इसी साजिश के तहत जैन -पंथ को सनातन धारा से अलग करवाया इसे भी एक अलग धर्म की मान्यता मिली।

ऐसी  लगातार विखंडन की   एक  परिणति गोधरा कांड भी  थी ,जिसके तहत जेहादियों ने यह सन्देश दिया था -जो अयोध्या और राम का नाम लेगा उसका यही हश्र होगा।

आज इस संदर्भ का जेहन में चले आना आकस्मिक नहीं है ,गुजरात हाई -कोर्ट का वह फैसला है जिसके तहत फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील किया गया है। क्या कुछ संविधानिक तकाज़े रहें हैं इस मामले में ऊंची कचहरी की इस फेरबदल पर हमें कुछ नहीं कहना है।
अलबत्ता जिस तरह से भारतीय प्रिंट और इलेक्त्रोनी मीडिया ने इस खबर को नज़रअंदाज़ किया है वह भारत धर्मी समाज को ज़रूर खबरदार करता है। चौंकाता है ,आगाह करता है ,पूछता है खुद को मुस्लिम फस्टर्स कहने वाले कट्टर पंथियों द्वारा रचित गोधरा के फांसी पाए मुज़रिमों को कोर्ट की राहत पर वह खामोश क्यों है ?यह वही मीडिया है जो उसी दौर में एक मुसलमान एमपी के आगकी लपटों  में घिर जाने का तप्सरा बरसों बरस सुनाता रहा ,कई महीनों क्या सालों यह ज़नाज़ा निकला।

पूछा जा सकता है -

"भारतीय युवा क्या तब जागेगा जब उसके नाम पर भी तलवार चलायी  जाएगी ,पूछा जाएगा उससे -तुम्हारा नाम 'नन्द लाल क्यों है 'अकबरादुद्दीन क्यों नहीं है।कुंजबिहारी क्यों हैं आज़म खाना क्यों नहीं है ? मुरारी लाल क्यों है मोहम्मद अली क्यों नहीं है ?

खुद को मुस्लिम पहले समझने बूझने मान ने वाले जेहादी सोच के लोग यही सोचते होंगें इस फैसले पर  -हमारा कोई क्या कर लेगा ,अधिक से अधिक आजीवन कारावास ,उससे क्या हमारा खूंटा उखड़ता है ?

"राम का नाम भी लोगे तो ऐसे ही जला दिए जाओगे।"तौबा करो अयोध्या से अब वरना ...हश्र जानते ही हो।  

भारत धर्मी समाज  को काटा जा रहा है ,गोधरा के जेहादियों का यही सन्देश जा रहा है , हम जो कुछ भी करें  ,हम्हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता इस देश में। कहाँ गए नेहरू के वंशज?जिन्होनें इस अलहदगी की नींव  रखी जिन्ना को सरआंखों पर बिठाया ?सब खामोश ही नहीं संतुष्ट हैं मय अपने  पाले हुए प्रवक्ताओं के।

हमारा इस पोस्ट के मार्फ़त सम्पूर्ण भारत -धर्मी- समाज से आवाहन है इस मामले को ,गुजरात उच्च न्यायालय के मौजूदा फैसले के खिलाफ वह उच्चतम न्यायालय  जाए।

जाग जवानी भारत की  ,
कह  अलग कहानी भारत की।

संदर्भ -सामिग्री :यह विचार मानने डॉ नन्द लाल मेहता वागीश जी के हैं जो इस देश के न सिर्फ एक प्रखर विचारक हैं ,भारत धर्मी समाज के एक समर्पित सिपाही भी हैं। उनसे हुई फोन -वार्ता ही हैं ये उदगार जिसमें हमारी भूमिका श्रोता की थी। 

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

पानी पानी पानी पानी , बन के सुनामी त्रास है पानी , मृत्यु और अकाल है पानी , जलप्लावन का सार है पानी।

झरोखा सेहत का :एक सामान्य हेल्दी   व्यक्ति को प्रतिदिन

- कितना पानी पीना चाहिए ,और क्यों ?

(१ )क्या आप पर्याप्त पानी पी रहे हैं रोज़ाना ?

(२ )पानी का इंटेक ,आपके द्वारा दिन भर में पीया गया पानी -न सिर्फ आपको चार्ज्ड रखता है ,जलनियोजित  (Hydrated )रखता है,जल नियोजन के लिए जलमिश्रित बने रहने के लिए भी ऐसा ज़रूरी समझा गया है। नाज़ुक चीज़ है आपके शरीर का जल -नियोजन, जल -बजट.हाइड्रेटिड बने रहना। 

आपके द्वारा ग्रहण की गई कैलोरी का यह विनियमन भी करता है नियंत्रित भी करता है कैलोरी इंटेक को ,आपके बॉडी वेट (भार या वजन )को। भूख से प्यास का  कोई संबंध नहीं है ,भूख और चीज़ है प्यास और। 

(३ )राष्ट्रीय चिकित्सा अकादमी (अमरीकी )पुरुषों के लिए प्रतिदिन ३. ७ लीटर तथा महिलाओं के लिए २. ७ लीटर जल रोज़ाना पीने  की सिफारिश करती है। इसमें जलीय पेय भी शामिल हैं अन्य स्रोतों जलीय तरकारियों ,सलाद (ककड़ी ,खीरा ,मूली गाजर आदि -आदि) से चले आने वाला जल भी शामिल है। अल्कोहल इस वर्ग में नहीं आएगा जो बॉडी को डिहाइड्रेट(निर्जला ) करता है -एक बूँद नीट शराब जबान से १००० बूँद पानी खींच लेती है। 

(४ )जल आपके जोड़ों को स्नेहिल बनाये रहता है एक स्नेहक का काम करता है रुक्ष होने से बचाता है। लम्बी दौड़ हो या कोई भी ऑक्सीजन की अधिक खपत और मांग करने वाला व्यायाम या कसरत -जल आपके दमखम को बनाये रहता है। महज मिथ है कि पसीने में पानी नहीं पीना चाहिए। लम्बी दौड़ के धावक छोड़िये रोज़मर्रा की लम्बी सैर के दौरान भी बा -खबर लोग पानी की बोतल साथ रखते हैं। 

(५ ) आपके मिज़ाज़ को खुशनुमा सचेत एवं स्फूर्त ,तथा अल्पावधि याददाश्त को बनाये रखने में भी आप की  मदद करता है - पर्याप्त जल नियोजन।जल का अभाव होने पर आप  की एंग्जायटी (बे -चैनी )बढ़ जाती है। 

(६ ) लिटमस पेपर टेस्ट है आपके जल नियोजन को आंकने का -देखिये आपको प्यास कितनी लगती है आपके पेशाब का रंग कैसा है ?यदि आप  प्यासे नहीं हैं ,प्यास  का एहसास नहीं है और रंग हल्का -पीला तकरीबन -तकरीबन पारदर्शी है तो आपके शरीर का जलमान ,जलनियोजन ,हायड्रेशन लेवल ठीक है। 

(७ )आपके जलनियोजित होने रहने पर आपका दिल धमनियों में पर्याप्त खून सुगमता से भेजता है और ऐसे में आपकी पेशियाँ भी आसानी से पर्याप्त जलीकृत बनी रहतीं हैं ,स्नेहित बनी रहती हैं ।

 डीहाईड्रेटिड  रहने पर आप अपने दिल का काम बढ़ा लेते हैं। दिल को उतना ही रक्त उठाने धमनियों में उलीचने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती हैं। 
(८ )जल -मिश्रित (वेळ -हायड्रेटिड )रहने पर मूत्र मार्ग क्षेत्र के संक्रमण (यूरिनरी ट्रेक्ट इंफेक्शन )के खतरे कमतर रहते हैं। किडनी स्टोन बनने की संभावना डीहयड्रेटिड रहने पर इसलिए बढ़ जाती है ,आपके पेशाब में मौजूद खनिज लवण मणिभ (रवे या Crystals )बनाने लगते हैं। 

(९ )खीरा -मूली -गाजर ककड़ी ,सेलरी ,लेटस , कुरकुरा ताज़ा कच्चा ब्रोक्क्ली  आपके द्वारा ग्रहण जल की मात्रा में ही गिना जाता है। भोजन में इनका अपना महत्व है। तमाम ज़रूरी खनिज यहां से आपको मिलते हैं। 

(१० )जलनियोजित रहने पर आपका पाचन क्षेत्र बा -खूबी काम करता है। प्यासा जलहीना रह जाने,पानी की कमी हो जाने  पर आपका मल(बिष्टा या एक्स्क्रीटा  ) सूख जाता है कब्ज़ रहने लगती है। अक्सर हमारे बुजुर्ग ज़रुरत से बहुत कम जल पीते हैं। 

जलनियोजन से महरूम शरीर बिष्टा (मल )से जलीय अंश वापस खींच लेता है। 

(११ )हाइपो -नाट्रेमिअ या जलविषाक्तण (Hyponatremia or Water-Intoxication ):

हमारी किडनियां (गुर्दे )प्रतिघंटा सौ मिली -लीटर (आम भाषा में सौ ग्राम या एक ग्लास पानी  )  ही हेंडिल कर सकतीं हैं। अब ऐसे में कोई दसलिटर पानी एक साथ गटक ले ,बहुत कम समय में ही सही ,एक के बाद सांस ले लेकर दूसरा फिर तीसरा ग्लास पानी का .....  पी ले तो किडनियां ज़वाब दे जातीं हैं। इस पानी को ठिकाने लगाना उनकी सीमा से बाहर है।  यह मेडिकल कंडीशन है ,फ़ौरन ध्यान न देने पर व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। 


बचपन में एक खेल देखा था -सर्कस का एक कलाकार एक बड़ा जार पानी एक बार में ही पी जाता था ,लेकिन फ़ौरन उसे उगल भी देता था। पानी में कई मर्तबा छोटी -छोटी मच्छी भी रहतीं थीं जिन्हें वह लगातार निकाल -निकाल के दिखाता था। कौतुक दिखाने के चक्कर  में आप कभी भी ऐसा न करें। 

वाटरटोक्सीमिया के मामले में पानी की अतिरिक्त मौजूदगी हमारे शरीर में खनिजों का स्तर खतरनाक तरीके से गिरा देती है इसीलिए इस स्थिति को -हाइपो (यानी सामान्य से नीचे का स्तर )नाट्रेमिया कहा गया है। 
अन्य वजहें भी रहतीं हैं इस मेडिकल कंडीशन की :यथा -

देखें उल्लेखित सेतु :

(१ )https://www.google.com/search?q=what+is+hyponatremia+and+what+causes+it&rlz=1CAACAP_enUS646US647&oq=what+is+hyponatremia+&aqs=chrome.5.69i57j0l5.22117j0j1&sourceid=chrome&ie=UTF-8

(२ )Hyponatremia. Hyponatremia is decrease in serum sodium concentration < 136 mEq/L caused by an excess of water relative to solute. Common causes include diuretic use, diarrhea, heart failure, liver disease, renal disease, and the syndrome of inappropriate ADH secretion (SIADH).

(३ )https://www.webmd.com/fitness-exercise/features/water-intoxication#1

How much would you have to drink? An enormous amount. Gallons and gallons of water.
"These are very isolated cases, and this is extremely rare," says Sharon Bergquist, MD. She's an assistant professor of medicine at Emory University School of Medicine in Atlanta. "More people by far and away are dehydrated, [rather] than having a problem with over-hydration."




What Is Water Intoxication?


If you drink a bottle of water here and there when you exercise or when you're hot, you’ll be fine. Where you run into problems is drinking way too much too fast.

कुलमिलाकर लब्बोलुआब यही है :अति सर्वत्र वर्ज्यते ,बोले तो -

अति का भला न बोलना ,अति की भली न चूप (चुप्प ) ,
अति का भला न बरसना ,अति की भली न धूप। 
आपका शरीर एक खेत की तरह हैं इसे सींचिये लेकिन उतना ही जितना ज़रूरी है इसके सुचारु संचालन के लिए। कुछ मेडिकल कंडीशंस में यथा -प्रोस्टेटिक एंलार्जमेंट के मामलों में  एक साथ एक लीटर या और भी ज्यादा पानी  पीना वांछित नहीं है। गुर्दों का काम बढ़ जाता है। 
कुछ खास यौगिक और इतर किर्याओं को करने वाले लोग उष: पान करते हैं एक साथ एक डेढ़ लीटर पानी सुबह -सुबह बासी मुंह पी जाते हैं । यह सबके के लिए न तो सम्भव है न अक्लमंदी का काम है न  मुनासिब ही है । 
(१२ )पर्याप्त जलनियोजन बनाये रखने के और कई फायदे हैं ,सिरदर्द की अवधि और तीव्रता बर्दाश्त के अंदर रहती है। कमतर रहती है। दूसरे छोर पर मीग्रैन (आधा -शीशी का पूरा उग्र  सिरदर्द ) के मामलों  में जलनियोजन का अभाव ,पानी की कमी होने पर मीग्रैन का दौरा  भड़क सकता  है। 
जलनियोजन को बनाये रहने जल की कमी से बचे रहने के लिए अपने साथ हमेशा पानी की बोतल रखिये चाहे फिर वह सैर -सपाटा हो  या किसी भी अन्य किस्म की आउटिंग। रेस्त्रां में वेटर पहले पानी लाता है गटक लीजिये। 
अपनी  खुराक  में फल -सलाद आदि कोशिश कीजिए खुराक का ४० फीसद हिस्सा घेरे रहें। 
यह आकस्मिक नहीं है कहा गया है -जल ही जीवन है। हमारे शरीर का अधिक  भाग पानी ही है। वयस्कों में शरीर का औसतन ५७ -६० फीसद हिस्सा जल ही रहता है।
एक साला होने से पहले शिशुओं में जल की मात्रा ७५-७८ फीसद रहती है जो एक साला होने पर घटके औसतन ६५ फीसद रह जाती है। 
शरीर में मौजूद कुल पानी का दो तिहाई अंश इंट्रा -सेलुलर (कोशिकाओं के बीच में )तथा शेष एक तिहाई इनके बाहर रहता है। पानी हमारी कोशिकाओं का बुनियादी कच्चा माल है जिसका उपयोग कोशिकाओं की वृद्धि में सहायक होता है। 
हमारा कुदरती  तापनियामक- थर्मोस्टेट है जल।
जहां हमारे शरीर में प्रोटीनों और कार्बोहाइड्रेटों के  चय -अपचयन (मेटाबॉलिज़्म )में पानी की जरूरत रहती है वहीँ यह लार के लिए आवश्यक जिंस है जिसकी पाचन में महती भूमिका रहती है। 
हमारे शरीर से मलबा ,अवांछित कचरा ,गैर -ज़रूरी पदार्थ निकालने का एक तंत्र है पानी। गर्भ- जल ही हिफाज़त करता है गर्भस्थ की। जन्मजात  शोक अब्जॉर्बर है शरीर का जल। संभाल के रखता है हमारे दिल औ दिमाग अन्य महत्वपूर्ण अंगों को।  

देखें सेतु :
https://www.thoughtco.com/how-much-of-your-body-is-water-609406

विशेष :पानी को आब कहा गया है मुक्तावली  (दन्तावली ) का पानी(इनेमल )उतर जाये तो दांत बे -आब। सच्चे मोती का पानी उतर  जाये तो दो कौड़ी का। आदमी की आँखों का पानी उतर   जाये तो  बे -शर्म ,निर्लज्ज कहाये।पानी -पानी हो जाये।  

आब गई आदर गया नैनं गया स्नेह।  

मुहावरों लोकोक्तियों से बाहर निकलके देखिये तो पानी की समस्या दिनों दिन जटिल होती जा रही है यहां तक की पानी के बंटवारे को लेकर एक बड़ा युद्ध भी राष्ट्र -राज्यों के बीच छिड़ सकता है। गुज़रे ज़माने की फिल्म 'चम्पाकली' और 'दो बूँद पानी 'पानी की समस्या को बेहतरीन तरीके से उठाती हैं।   

हमारे शरीर में ही नहीं हमारे पर्यावरण में भी पानी का संरक्षण ज़रूरी है। पंचभूतों में से एक आवश्यक तत्व है पानी।इसीलिए कहा गया है 'बिन पानी सब सून ' . 

हमारी नदियों  का जल स्वादिष्ट और पीने योग्य था ,नदियाँ प्रदूषित हुईं जल गंदला ला  गया ,

'जल गया जीवन गया'। नदियों के जल का संरक्षण बे -हद ज़रूरी है।

https://www.youtube.com/watch?v=m8cuLrSIWD8 

जगत की नश्वरता का रूपक भी प्रस्तुत करता है  पानी :

जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ,

जग रचना तैसे रची कहु नानक सुन मीत। (गुरुग्रंथ साहब नौवां महला श्लोक संख्या २५ )

पानी केरा बुदबुदा अस मानस की जात,

देखत ही बुझ जायेगा ,ज्यों तारा परभात।

इसलिए जीवन का उपहार ही नहीं मृत्यु और संहार भी पानी है :

पानी पानी पानी पानी ,

बन के सुनामी त्रास है पानी ,

मृत्यु और अकाल है पानी ,

जलप्लावन का सार है पानी। 

नेक माया के स्वरूप को भी समझाता है पानी :

कबीर कहते हैं :

पानी में मीन प्यासी रे ,

मोहे सुन -सुन आवत हांसी रे। 

भावसार :परमात्मा का आत्मा से विछोह हैं यहां यद्यपि परमात्मा सब जगह है लेकिन माया शक्ति (अपनी इलूज़री एनर्जी ,भौतिक या मटीरिआल ऊर्जा से आवृत्त परमात्मा से जीव का विछोह बना ही रहता है। माया में प्रतिबिंबित ब्रह्म को ही ईश्वर कहा गया है। यह जगत भी एक प्रतीति मात्र है ,जल में रहते हुए भी मछली अपने जीवन के आधार ब्रह्म को बूझ नहीं पाती।
जलथल सागर हूर रहा है भटकत फिरी  उदासी रे 

ये जीवन समुन्दर की मानिंद ही है जिसकी थाह नहीं पाई जा सकती। हमारा मन उस परमात्मा की खोज में भटकता ही रहता है। 
आत्मज्ञान बिना नर भटके ,कोई मथुरा कोई काशी रे। 

"स्व ''  अपने निज आत्म स्वरूप का ज्ञान न होने की वजह से ही हम बाहर उस सुख की खोज करते फिर रहें हैं उस आनंद को ढूंढ रहें हैं जो हम ही हैं। हमारा रीअल सेल्फ ही सच्चिदानंद है। 

कहत कबीर सुनो भइ साधो ,सहज मिले अविनाशी। 

अपने अंदर उसे ढूंढना सहज है। बस जो मैं नहीं हूँ वह मेरा अज्ञान खत्म हो जाए जो इस शरीर को सच माने हुए है। शरीर तो एक टेन्योर है कालावधि है अभी है अभी नहीं है यही तो माया है :

पानी केरा बुदबुदा अस मानस की जात  

कबीर ने अन्यत्र भी कहा  है :
मोको कहाँ ढूंढें रे बंदे मैं तो तेरे पास में।
भजन और शरणागत होना नाम सिमरन श्री गुरुग्रंथ साहब जी का सार है :

गुण गोविन्द गाइओ  नहीं ,जनम अकारथ कीन ,

कहु नानक हरि भज मना ,जिहि बिध जल कौ मीन। 

यहां भी जल का रूपक है जो मछली का जीवन है ,मछली को पका के खाने के बाद भी वह पानी मांगती  है।मच्छी जो खाते हैं वे जानते हैं इसे खाने के बाद प्यास ज्यादा लगती है। प्रीति  हमारी वाह गुरु से मछली जैसी होनी चाहिये थी लेकिन  हम ने इस जीवन को व्यर्थ कर दिया जीवन के व्यापारों में उसका (वाह गुरु का गुण गायन उसकी प्रशंशा उसके गुणों का बखान ही नहीं किया।  )यूं ही जीवन व्यर्थ गँवा दिया -मानुस जनम अमोल था कौड़ी बदले जाये। 
https://www.youtube.com/watch?v=h33YJ7zQ_dc
    
सन्दर्भ -सामिग्री :(१ )http://www.cnn.com/health