बुधवार, 22 नवंबर 2017

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 13 Part 2,3

टूटत ही धनु हुओ विवाहु 

वैसे तो विवाह पुष्प वाटिका में ही हो चुका ,अब तो धनुष भी टूट गया ऐसा करो इस महोत्सव में दशरथ जी भी गाजे बाजे के साथ बरात लेकर आएं ,इसीलिए इस उत्सव की शोभा बढ़ाने के लिए विवाह निमंत्रण अयोध्या भी राजा दशरथ के पास भेजो -ऐसा कहा गुरु विश्वामित्र ने जनक जी। 

यहां जनकपुर से दो सेवक चले हैं जब राजमहल में पहुंचे हैं तो ऐसा समाचार राजा दशरथ के पास भेजा गया -जनकपुर से दो दूत आएं हैं भगवान् राम के विवाह का सन्देश पत्रिका (न्योंता )लेकर। 

दशरथ जी ने कहा तुरंत बुलाइये- 

"मुदित महीप आप उठ लिए "-

राजा दशरथ सचिव से बोले जो सेवकों का सन्देश पढ़कर राजा को  सुनाने के लिए उठे थे -

" मुझे दो सन्देश -पत्र मैं  स्वयं पढूंगा। "

"भगवान् का सन्देश तो स्वयं ही पढ़ा जाता है किसी नौकर सचिव से नहीं पढ़वाया जाता यही सन्देश देती है कथा यहां पर। "

"चक्रवर्ती नरेश स्वयं खड़े हुए -प्रेम पत्र स्वयं ही पढ़ा जाता है सोचते हुए "

 "वारि विलोचन बाँचत पाती 

तुलसी दास भर आईं छाती। "

"चिठ्ठी पढ़ रहें हैं मतलब भगवान् का पाठ पढ़ रहे हैं "

पूजा -पाठ अपना स्वयं ही किया जाता है किसी और से नहीं करवाया जाता। 

केवल बैठने मात्र से प्रभु को संतोष हो जाता है पाठ पढ़ो उनका खुद बैठकर।

"पहिचानत तब कहहु सुभाउ  ,

प्रेम विवश पुनि -पुनि महि कहहु   राउ। "

जनकपुर से आये दोनों सेवकों से राजा दशरथ बार -बार पूछते हैं क्या तुमने मेरे दोनों पुत्रों को देखा है ,उन्हें पहचानते हो यदि हाँ तो मुझे बताओ उनका स्वभाव कैसा है। 

(स्वभाव से ही व्यक्ति पहचाना जाता है ,राम का स्वभाव सदैव ही मृदु और कोमल रहता है सब के साथ )-

राजा का औत्सुक्य अपने शिखर को छू रहा है बार -बार दोनों सेवकों से कहते हैं मुझे सब कुछ बतलाओ ,मेरे बेटे कितने बड़े हो गए हैं अब ,और कैसे हैं  ?

मैं जानहुँ निज सुभाऊ ,

बोलन मिलन विनय मन हरनी ,

पहचानु  तब कहउ सुभाऊ। 

विनय शील -करुणा अतिसागर। 

रानियां बार -बार छाती से पत्र लगातीं हैं ,भगवान का पत्र -अवतार हो गया है मानो राजमहल में ।

सरितन जनक बनाये सेतु .... 

भगवान् का जन्म दो राज्यों में सेतु बनाने के लिए ही होता है। 

जनक जी ने मिथिला से लेकर अयोध्या तक सेतु बाँध दिए। बरात आनी है उसे कोई असुविधा न हो। 

जानि सिया बरात पुर आई ........

हृदय सिमिर कर सब सिद्धि बुलाई। 

जानकी जी ने समस्त सिद्धियों को बुला लिया है  ताकि ब्रह्म परिवार की आवभगत में कोई कमी  न रह जाए। त्रिदेव बरात में भेष बदल के आये हैं।ये शादी जगत के माता पिता की हो रही है। भगवान् की हो रही है। कोई मामूली विवाह नहीं है। 

ये सिया रघुवीर विवाह ...... 

सम -समधी हम देखे आज -

सारे बाराती कहने लगे -ब्रह्म के पिता युगल  आपस में मिल रहे हैं दो समधियों के रूप में -जनक और दशरथ । समान स्तर के ब्रह्म ग्यानी हैं ये दोनों सम -धी-दशरथ जी और जनक जी। 

राम और भरत में साम्य देख के पूरे जनकपुर  में असमंजस पैदा हो गया इन चारों वरों में भरत कौन है राम कौन है।

मिथिला  नगरिआ निहाल सखी रे ,

चारो दुल्हा में बड़का कमाल सखी रे  ! 

जिनके साथ जोगी ,मुनि, जप, तप, कईन,

जेहि हमरा मिथिलाके मेहमान भइय्यन (भैयन)  . 

सांवरे सलोने सारे दुल्हा कमाल  छवि रे ,

हाँ ,कमाल !सखी रे ....  

अपने चंचल मन के घोड़े का तार भगवान् के साथ जोड़ो फिर उनका घोड़ा जिधर भी ले जाए चलो यह पहला सूत्र है भगवान् के साथ विवाह का।

भगवान् दूल्हे के रूप में जिस घोड़े पर बैठे हैं वह इतना तेज़ चलता है के गरुण भी शर्माने लगा।  

राघव धीरे चलो ससुराल गलियां -....... 

मिथिला की नारियां गाने लगीं हैं। 

ये भक्ति का मार्ग है भक्ति की नगरी है भक्ति और भजन धीरे -धीरे ही चलता है। सीता जी को भी यही कहा गया था -

धीरे चलो सुकुमार सिया प्यारी .....  

सखियाँ जानकी जी को तैयार करके लाईं  हैं ,देवता लोग जगत जननी को मन ही मन प्रणाम करते हैं। 

वशिष्ट जी ने कहा राजन कन्या 

दान करो। 

सुनैना भगवान् की आरती उतारतीं हैं।जनक जी रोते -रोते कन्यादान करते हैं कन्या दान का मतलब होता हैँ निष्काम  भक्ति।  भाँवरें पड़ने लगीं हैं :

छायो चहुँ दिश प्रेम को रंग ,

परन  लागि भाँवरियाँ ,सिया रघुवर जी के संग ,

परड़ लागि भाँवरिया ..... 

तीनों बेटियों को भी इसी मंडप में ब्याह दिया जनक जी ने , मांडवी  जी को भरत के साथ ,उर्मिला जी को लक्ष्मण जी के साथ , सुकीर्तिजी को शत्रुघ्न के साथ। 

चारों दम्पति जब दसरथ जी को प्रणाम करने आये दशरथ जी भावावेश में एक शब्द नहीं बोल पाये ,इतने भाव -विभोर हो गए -जैसे चारों पुरुषार्थ धर्म -अर्थ -काम -मोक्ष एक साथ पा गए हों। 

हल्का फुल्का हंसी मज़ाक व्यग्य विनोद बाण जानकी जी की सखियाँ चलाती हैं फेरों के वक्त -कहतीं हैं लक्ष्मण जी से तुम बहुत बड़बक करते हो माफ़ी मांग लो हम से नहीं हम पोल खोल देंगी अयोध्या की ,अयोध्या वालों को आता ही क्या है -खीर खा खा के तो महिलायें बच्चे पैदा करतीं हैं ,पुरुष तो बच्चे भी पैदा नहीं कर सकते -तुम चारों भाई तो यज्ञ का प्रसाद पाकर ही रानियों ने पैदा किये थे। 

लक्ष्मण जी कब चूकने वाले थे बोले -हमारे यहां तो खीर से ही काम चल जाता है तुम्हारे यहां जनकपुर में तो बच्चे धरती में से खोद -खोद के निकाले जातें हैं। जानकी जी धरती में से ही प्रकट हुईं थीं। 

"भक्ति में देह का भान नहीं रहता वही भक्ति निष्काम होती है -ये क्या हुआ जानकी जी की सखियाँ जनकपुर पक्ष के लोगों के नाम ले लेकर ही गाली गाने लगीं ,जनक जी बोले ये क्या करती हो। "

-हुआ ये था सकुचाते राम पर व्यंग्य कस रहीं  थीं  सखियाँ -तुमने तो अपनी बहन को भी सींगों वाले के साथ ब्याह दिया था। भगवान् नज़र उठाकर ऊपर देखते हैं सखियाँ सम्मोहित हो जातीं हैं भगवान् की इस अप्रतिम मोहिनी छवि को देख कर और और मोहित होकर अपने पक्ष के लोगों को ही गाली गाने लगतीं हैं।

विदा का समय भी आ पहुंचा है पूरी जनकपुर नगरी अश्रुपूरित है सुनैना जी जानकी जी से लिपट  कर रो रहीं हैं।सखियाँ अन्य स्त्रियां जनकपुर की सुनैना जी को समझा रहीं हैं -ये क्षण तो हरेक बेटी के जीवन में आता ही है आपके जीवन में भी आया था जब आप अपने पिता को बिलखता रोता छोड़ आईं थी राजमहल में। परमज्ञानी ब्रह्मज्ञानी जनक नहीं पिता जनक भी रो कलप रहे हैं। 

"पति जिस व्यवहार से प्रसन्न हों वैसा ही आचरण करना बेटी -दोनों परिवारों की लाज होती है बेटी -अब ये तुम्हारे हाथों में है -ये हिदायत देती हैं सुनैना जी जानजी को विदा वेला में। "

और जानकी जी इस स्थिति का पालन तब भी करती हैं जब उन्हें अयोध्या छोड़कर जाना पड़ता है वह भी तब जब वह आठ माह की गर्भवती होतीं हैं। क्योंकि रामराज्य  की शासन मर्यादा का सवाल था जहां एक धोभी भी मायने रखता है।तोता मैना भी बिलख रहें हैं - 

शुक सारिका  जाई ,

व्याकुल तहाँ है  वैदेहि। 

शुक और सारिका भी विदा वेला में  आशीर्वाद गाने लगते हैं। 

तेरो सुहाग मनाऊँ ,इतर  फुलैल लगाऊँ 

कलियाँ चुन चुन सेज़ बिछाऊँ ,

पीया प्यारी को उढाऊ  ,मनाऊँ 

रसीली बैन सुनाुऊं  मनाऊँ   . 

मुझे कोई सुविधा नहीं चाहिए। तेरा जूठा खालूंगी . ....मुझे भी अपने साथ ले चलो। 

मुझे कुछ नहीं चाहिए। 

(आज की कथा का विराम आता हैं यहां पर .....  आगे की कथा अगले अंक में ...)  

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 13 Part 2


(२ )

मंगलवार, 21 नवंबर 2017

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 13 Part 1 ,2

कल भगवान् ने धनुष भंग किया था। भगवान् ने उस के दो खंड कर दिए ,कैसे भगवान् ने उस धनुष को  देखा ,कब उठाया ,बीच में क्या हुआ न कोई जान पाया न देख पाया न समझ पाया -सबने बस इतना देखा धनुध दो खंडों में भूमि पर टूटा हुआ पड़ा है। भगवान् जो करता है उसे दिखाता नहीं है बस वह हो जाता है हमें दिखाई नहीं देता। भगवान् जो देता है वह दिखाई नहीं देता ,किधर से क्या कर गया भगवान् दिखाई नहीं देता। बस हो जाता है।

 हम हल्ला बहुत करते हैं ,दिखावा बहुत करते हैं काम बहुत कम करते हैं ,शो बाज़ी ,शोबिजनिस ज्यादा करते हैं इसीलिए मनुष्य को कभी यश नहीं मिलता क्योंकि आप जो भी कुछ कर रहे हैं यश के लिए कर रहें हैं। 

भगवान् का अपयश कभी नहीं होता। वह यश के लिए कुछ नहीं करते हैं। बस जो भगवान् चाहते हैं वह हो जाता है। 

हमारा अहम नाक पर रखा रहता है किसी समारोह में बैठने के लिए सीट न मिले हम अपमानित महसूस करने लगते हैं। तुनक जाते हैं अपसेट हो जाते हैं ज़रा सी बात पर। भगवान् को राजभवन से निकाल दिया गया था भगवान् परम् संतुष्ट कोई असंतोष नहीं किसी को दिखाइ  दिया समभाव दिखा उनके चेहरे पर वही प्रसन्नता दिखाई दी ।इससे पूर्व जब राजतिलक की घोषणा हुई थी तब भी यही प्रसन्नता और समत्व था उनके चेहरे पर। धनुष भी उसी समत्व भाव को बनाये हुए तोड़ दिया। किसी को भी पता नहीं चला धनुष भंग का। 

इधर जय जैकार हो रहा था -

तेहि अवसर सुनी शिव धनु भंगा 

तभी चमचमाता हुआ फरसा लेकर परशुराम जी का आगमन हो  गया। जनक जी और परशुराम जी समकालीन महापुरुष हुए हैं। 

जनक जी क्षत्रीय कुल में जन्मलेते हैं लेकिन व्यवहार ऋषि योचित करते हैं ब्रह्मणों जैसा करते हैं ,हमेशा शास्त्र हाथ में रखते हैं।

जबकि शास्त्र हाथ में रखना चाहिए परशुराम  को । ब्राह्मण  परिवार में पैदा हुए थे लेकिन  परशुराम का नाम ही  फरसराम पड़  गया चोबीस घंटों इनके हाथ में फरसा रहता है जबकि ये  जन्म से ब्राह्मण  हैं।इनकी मान्यता है भय के बिना शासन नहीं चलता। इनका   व्यवहार  क्षत्रियों जैसा हैं ।

परशुराम जी का दर्शन अपूर्ण था ,धमका कर कुछ देर तो व्यवस्था आप चला सकते हैं देर तक नहीं ,विद्रोह होते देर नहीं लगती। 

जनक जी को कहते हैं :हे मूर्ख जनक !तूने इतने राजा कैसे एकत्र किये ये धनुष किसने तोड़ा?भगवान् एकदम आगे आये विनयपूर्वक बोले -जिभ्या रसना है रसीली है इससे कठोर भाषा नहीं बोलनी चाहिए। 

"नाथ शम्भु धनु -भंजन - हारा,

होइये एक दास तुम्हारा।" 

हे नाथ धनुष तोड़ने वाला कोई आपका सेवक ही होगा। सुनो राम जिसने भी धनुष तोड़ा है उसे अलग निकाल के रख दो वरना सब राजा मारे जाएंगे। 

विश्वामित्र जी से लक्ष्मण जी ने कहा आज्ञा हो तो मैं बात कर आऊँ इस बाबा से ।

बोले लक्ष्मण जी परशुराम से - हे बाबा तुम्हारा क्या लेना देना है इस धनुष से जिनका धनुष है वह शंकर जी तो नांच रहे हैं। तू कौन के खामख़्वाह।ऐसी धनुइयां तो खेल -खेल में हम ने कितनी तोड़ डाली।तब तो आपने कुछ कहा  नहीं। अब क्यों मछर रहे हो ?इस धनुष से तुम्हारी बड़ी ममता है तुम्हारा क्या मतलब है ?

कौन सी धनुइयां की बात कर रहे हो हम तो कभी अयोध्या गए नहीं बोले परशुराम जी।  तब लक्ष्मण जी ने एक बहुत पुराना किस्सा याद दिलाया -

हुआ ये के परशुराम जी को आग्नेय अस्त्र एकत्र करने का बड़ा भारी शौक  था। इनकी आयुद्ध शाला मन्त्र सिक्त अस्त्रों से जब पूरी भर गई।पृथ्वी पर बोझ बढ़ गया जो पृथ्वी के बेटे शेषनाग पर पड़ रहा था। 

 पृथ्वी पर हड़कंप मच गया आज भी यही स्थिति है इतने एटमी आयुद्ध महाशक्तियों ने एकत्र कर लिए हैं इनका अकस्मात प्रयोग हो जाए तो पृथ्वी कई बार नष्ट हो जाए। 

पृथ्वी ने घबराके एक विधवा ब्राह्मणी का भेष भरा और अपने बेटे शेष (लक्ष्मण जी )को गोद  में लेकर परशुराम जी के आश्रम में आ गईं।बाबा कोई काम मिलेगा ,मैं उपले पाथ  दिया करूंगी ,रसोई कर दिया करूंगी ,चौक  पूर दिया करूंगी और भी जो कहोगे वो सेवा करूंगी। परशुराम जी का इन्होने अपनी सेवा से धीरे -धीरे विश्वास  जीत लिया।एक बार परशुराम जी को कहीं बाहर जाना था चाबी ब्राह्मणी को सौप कर चले गए। यही तो ब्राह्मणी भेषधारी पृथ्वी चाहती थीं ,उन्होंने लक्ष्मण जो को आयुद्ध शाला में बुलाया और लक्ष्मण जी ने सारे आयुद्ध निष्प्रभ कर दिए बे -असर निष्प्रभावी कर दिया सबको क्योंकि लक्ष्मण जी वे सारे मन्त्र जानते थे। 

परशुराम जी ने लौटकर जब आयुध शाला एक दिन खोली तो हतप्रभ हो बोले ये किसने किया है ये तो सारे आयुद्ध मन्त्र सिक्त थे हर कोई इन्हें निष्प्राण कर ही नहीं सकता। मुझे सब कुछ सचसच बताओ। धरती विधवा ब्राह्मणी का भेष छोड़कर अपने असली रूप में प्रकट हुईं और सब कुछ कह दिया -ये मेरा बेटा शेष नाग है (अनंत शेष )इसके ऊपर लगातार इन आयुद्धों का भार बढ़ रहा था। अब अपरशुराम जी की इतनी हिम्मत कैसे होती साक्षात शेष नाग जब सामने खड़े हैं तो उनके सामने कुछ बोलें। लक्ष्मण जी ने यही किस्सा याद दिला दिया परशुराम जी को।

क्रोध के सामने परशुराम के विवेक के सब दरवाज़े बंद थे क्रोध में कुछ सूझ ही नहीं रहा था -क्रोध पूरी बात सुनने ही कहाँ दे रहा था। परशुराम आग बबूला हो रहे थे। बोले -ए ! राजा के लड़के !तुझे अकल नहीं है,सारा जगत जिसे जानता है उसे धनुइयां कह रहे हो। जब धनुष इतना विशेष है तो अपनी बुद्धि से ये तो सोचो -तोड़ने वाला भी विशेष ही होगा लक्ष्मण जी ने बाबा को ये कहकर फिर से हड़का दिया।  

खोटा लड़का ये बड़ा धूर्त है इसे मौत का भय नहीं है। अब लक्ष्मण जी तो साक्षात काल हैं उन्हें सब खोटा न कहें तो क्या कहें। लक्ष्मण जी तन के खड़े हो गए -परशुराम जी ने फरसा मारने के लिए उठाया लेकिन वो फरसा उठा ही नहीं।जिसे विश्वामित्र जी को सुनाते हुए उन्होंने कहा था अब इस उदण्ड बालक को कोई नहीं बचा सकता। 

फरसे का शास्त्र में अर्थ दान होता  है और दान दिखाया नहीं जाता। इसलिए फरसा उठा ही नहीं। लक्ष्मण जी समझाते हैं ,बाबा तुम्हें तो फरसा शब्द  का अर्थ भी नहीं पता। ये आपको शोभा नहीं देता लाओ हमने दो इसे। 

भगवान राम फिर आगे आ गए -

अपराधी मैं नाथ तुम्हारा .....

हे नाथ अपराधी  तो मैं हूँ ये बालक तो दूधमुख है परशुराम जी बोले ये दूधमुख नहीं है विषमुख है।जब तक तेरा भैया मेरे सामने रहेगा मेरा क्रोध  दूर नहीं होगा ,इसे मेरी आँखों से दूर करो। लक्ष्मण जी फिर मुस्काकर बोले बाबा आपअपनी आँखें बंद क्यों नहीं कर लेते? 

ओवर लुक करिये बंद कर लो आँख हर चीज़ देखी  नहीं जाती।व्यास पीठ कहती है हर चीज़ सुनो भी मत ,बच्चों की बातें होने दो ,न सुनो न उनके बीच में बोलो।हर चीज़ हर बात के लिए बच्चों को मत टोको।अशांत हो जाओगे परशुराम जी की तरह।  
अब तो परशुराम जी गन्दी -गन्दी गाली निकालने लगे भगवान् के लिए लक्ष्मण जी ये सहा नहीं गया आगे बढे बोले ये अस्त्र मुझे दो आपको शोभा नहीं देता। न गाली देना न ये अस्त्र। इतने हथियार काहे को ढ़ो रहे हो -गारी देने के लिए तो तुम्हारी जबान ही काफी है और फ़ालतू बोझा  क्यों उठा रहे हो इन अस्त्रों का। 

"गारी देत न पावहुँ  शोभा  ,

वीरपुरुष  तुम धीर अशोभा। "-बोले लक्ष्मण जी। 

आपको यूँ गारी देना शोभा नहीं देता। परशुराम बोले भगवान् से -मुझसे युद्ध करो। भगवान् बोले आप ऋषि हैं हम आप से युद्ध नहीं करेंगे। बोले परशुराम फिर राम कहलवाना बंद कर दो।मैं हूँ परशुराम। परशुराम अहंकार रखना चाहते हैं अपना। 
भगवान् ने अपना पीताम्बर हटा  दिया और अपनी छाती पर का वह चिन्ह दिखा दिया -हमने तो आपके पूर्वज ऋषि भृगु को भी कुछ नहीं कहा था  जिन्होंने हमारे सीने पर लात मारी थी। परशुराम भगावन के पैरो पर  गिर पड़े -अरे ये तो पूर्ण ब्रह्म का अवतार हैं मैं तो इनका ही अंश मात्र हूँ। और  मैं क्या- क्या अनुचित कह गया ,दोनों भाइयों से क्षमा मांगते हैं परशुराम जी। अंश अवतार का पूर्ण अवतार में विलय हो गया। परशुराम -राम मिलन संपन्न होता है। 

(आगे की कथा अगले अंक में ज़ारी रहेगी ... )

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 13 Part 1


(२ )https://www.youtube.com/watch?v=eTGVDRKBkhA

(३ )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 13 Part 2

सोमवार, 20 नवंबर 2017

Jesse Jackson Says He Has Parkinson's Disease:what is Parkinson's Disease?(Hindi)

हमारे नर्वस सिस्टम (स्नायुविक तंत्र )से ताल्लुक रखने वाले इस अपविकासी रोग पार्किन्जेंस रोग या पार्किन्जेंस सिंड्रोम में हमारे दिमाग के उस हिस्से से दिमागी कोशिकाओं (न्यूरॉन्स )का क्षय होने लगता है जो एक न्यूरोट्रांसमीटर (जैव -रसायन )डोपामाइन तैयार करतीं हैं।इस ब्रेन केमिकल का अंग संचालन में बड़ा हाथ रहता है। इस हिस्से के न्यूरॉन्स जब घटकर कमतर रह जाते हैं ,अंग संचालन असर ग्रस्त होने लगता है। 

अभी तलक इस रोग की पुष्टि के लिए कोई पुख्ता परीक्षण नहीं हैं कभी -कभार  रोग निदान -मिस -डायग्नोज़ड भी रह जाता है।ऐसे में फिर लक्षण ही रोग निदान का आधार बनते हैं। 

क्या होता है डोपामाइन बनाने वाली कोशिकाओं के कम रह जाने पर ? 

 नतीजा होता है अंग संचलान में बाधा जिसकी शुरुआत मामूली हाथ के हल्के से कम्पन या फिर पेशी के अकड़ाव   से होती है। लेकिन यह इस लक्षण के बढ़ते चले जाने की शुरुआत होती है जो धीरे -धीरे बढ़ता ही चला जाता है ,बद-से बढ़कर -बदतर हो जाता है।घर में भी चलने फिरने बात करने में मरीज़ को दिक्कत होने लगती है।  

 पेशीय संचालन नियंत्रण तो इसमें  असरग्रस्त होता ही है कुछेक अंग अकड़ने भी लगते हैं लोच कमतर होती जाती है संतुलन और समन्वयन अंग संचालन का बिगड़  जाता है।ठवन(Gait ) बिगड़ जाता है ,सीधा चलना मुहाल हो जाता है कालान्तर में।

स्वत : सम्पन्न अचेतन स्तर पर होने वाली हरकतें - पलकों का झपकना ,चलते समय हाथों का आगे पीछे जाना ,मुस्कुराना भी कमतर होता जाता है इस रोग में। शरीर के एक हिस्से ,एक पार्श्व ,एक साइड में लक्षण ज्यादा उग्र रूप लिए रहते हैं।   

रोग बढ़ने पर मरीज़ अपने रोज़ मर्रा के काम खुद नहीं कर पाता है ,बोलचाल अस्पष्ट बुदबुदाहट में ही बदल के रह जाती है जो साथ -साथ रहते सेवा करते हैं वही समझ पाते हैं इनका सम्भाषण। 

मैंने इस रोग की अंतिम अवस्था के मरीज़ भी देखें हैं। एक महिला हैं मेरे गुरु समान जिनका मैं अनुगामी आदिनांक रहा हूँ ,अविवाहित ही रहीं लेकिन इस रोग से ग्रस्त अपने पिता की उनके आखिरी क्षण तक ऐसे सेवा की जैसे नवजात शिशु की माँ करती हैं नहलाना ,पौंछना पुचकारना ,थपथपाना सब यही करतीं थीं। पिता के चले जाने के बाद बावरी सी रही काफी दिन। एक बेहद मारक खाली पन इन्हें घेरे रहा। आकाशवाणी से सम्बद्ध रहीं ,और शीर्ष  पद तक पहुंची।यहां तक की अंतिम संस्कार भी पिता का इन्होने खुद ही किया। पंडित जी को बतला दिया गया था अग्नि प्रज्वल्लित ये ही करेंगी। भाई पहुंचा था शमशान लेकिन तब तक अग्नि प्रज्वलित हो चुकी थी।

आज उसी भारत में माँ की कोख को ही गर्भस्थ कन्या की कब्र बना दिया जाता है।जबकि ऐसा समर्पण बेटियों में ही मिल सकता है। 

रोग के अन्य संभावित कारण : 

आनुवंशिक आधार भी होता है इस रोग का १५ -२५ फीसद मामलों में मरीज़ के परिवार में कोई एक और सदस्य इससे ग्रस्त रहता है। एक ख़ास जीवन इकाई (खानदानी अंश जीन के अलावा ,एक पूरे जीन  समूह की भी निशान - देही कर ली गई है जो इस रोग को लेकर शक के दायरे में आ चुका है। रोग के पीछे पर्यावरणी घटकों  (माहौल ,एनवायर्नमेंटल फैक्टर्स )का भी कुछ न कुछ हाथ रहा हो सकता है।

रिसर्चरों के अनुसार एक जीवन इकाई LRRK 2 में पैदा उत -परिवर्तन (जेनेटिक म्यूटेशन )का पारकंसिंज डिज़ीज़ के संभावित कारणों में  बड़ा हाथ हो सकता है।

लेकिन माहिरों के अनुसार ये उत -परिवर्तन भी मिश्र हो सकते हैं कई जीवन इकाइयों के समूह ऐसे आनुवंशिक परिवर्तनों में म्यूटेशंस में  शामिल रहे  हो सकते हैं जो अंततया इस रोग को हवा दे देते हैं.
शक की सुईं यद्यपि हमारे पर्यावरण में मौजूद कुछ रासायनिक टोक्सिनों (विष पदार्थ )यथा TCE और PERC की ओर भी घूम गई है लेकिन माहिर इसे रोग की अकेली वजह नहीं बतलाते हैं।      

पूरे विश्व में सत्तर लाख से लेकर कोई एक करोड़ लोग इस रोग से ग्रस्त होते हैं और अकेले अमरीका में साल दर साल साठ हज़ार मामलों में इस रोग की पुष्टि कर ली जाती है ,मुखर लक्षणों के आधार पर।

इस समय एक अनुमान के अनुसार उत्तरी अमरीका में ही इसके दस लाख मरीज़ मौजूद हैं। पचास से ऊपर आयु वर्ग इसका ज्यादा शिकार बनता है ,मर्द औरतों से ज्यादा इसकी चपेट में आते हैं। 

स्वास्थ्य विज्ञानों के राष्ट्रीय संस्थानों के अनुसार रोग का कोई इलाज़ यदयपि नहीं है लेकिन इसके साथ रहना सिखलाया जा सकता है लक्षणों के साथ तालमेल बैठाया जा  सकता है।कुछ राहत अवश्यमेव मिल सकती है।

इलाज़ रणनीतियां ? 

दिमाग का वह हिस्सा जो अंगसंचालन के लिए उत्तरदाई होता है  और जहां से डोपामाइन बनाने वाली कोशाएं कम रह जाती है किसी वजह से उन कोशिकाओं से ज्यादा डोपामाइन तैयार करवाने की रणनीति के तहत इस रोग के माहिर -लेवोडोपामिने(Levodo) एक और दवा कार्बिडोपा (Carbidopa)के साथ देते हैं। 

दिमाग के इस हिस्से को गहन उत्तेजन प्रदान करने की रणनीति के तहत कुछ इलेक्ट्रोड्स का प्रत्यारोप लगा दिया जाता है जिन्हें एक विद्युत् स्पंदन छोड़ने वाली युक्ति से जोड़ दिया जाता है। 
अवसाद (depression )के मरीज़ों पर भी यह रणनीति Deep Brain Stimulation आज़माई जाती है।आजकल अवसाद को एक स्वतन्त्र रोग का दर्ज़ा मिला हुआ है। 

तै ची (Tai Chi ) भी कुछ लोग पसंद करते हैं 

एक अभिनव रणनीति के तहत फीटल डोपामाइन सेल्स का प्रत्यारोप लगाने से उन मरीज़ों में लक्षणों का पचास फीसद तक शमन देखा गया  है जिन पर  दवाई अब कारगर  नहीं हो  रही थी।लक्षणों की उग्रता कम नहीं हो पा रही थी।

सन्दर्भ -सामिग्री :
Reference:
(१ )http://www.cnn.com/2016/11/07/health/parkinsons-disease/index.html
(२ )https://www.npr.org/sections/thetwo-way/2017/11/17/564836312/jesse-jackson-says-he          

The Rev. Jesse Jackson announced Friday that he has Parkinson's disease, saying that he first noticed symptoms "about three years ago."


Jackson, 76, released the news in what he called an update "on my health and the future."
The longtime political and social activist, who was part of Martin Luther King Jr.'s inner circle in the 1960s and who later founded the Rainbow PUSH Coalition, said that after noticing signs of the motor system disorder, he attempted to work through it.
"But as my daily physical struggles intensified, I could no longer ignore the symptoms, so I acquiesced," Jackson wrote in a statement released Friday.
"After a battery of tests, my physicians identified the issue as Parkinson's disease, a disease that bested my father," he said. "Recognition of the effects of this disease on me has been painful, and I have been slow to grasp the gravity of it."
Jackson has been receiving outpatient treatment for the disease from Northwestern Medicine in Chicago, which released its own short statement about his condition. The facility says Jackson was first diagnosed in 2015.


Jackson added, "For me, a Parkinson's diagnosis is not a stop sign," saying that he will do what he can to slow the disease, through physical therapy and changes to his lifestyle.
Parkinson's is most well-known for causing tremors and other muscle-control problems. It also causes rigidity and stiffness in parts of the body, and as it progresses, the disease leaves its victims with impaired coordination and balance, according to the National Institutes of Health. The disease has been linked to the loss of dopamine-producing cells in parts of the brain that control movement. There is no cure.
Here is the full text of Jackson's announcement, which he addressed to friends and supporters:
"On July 17, 1960, I was arrested, along with seven other college students, for advocating for the right to use a public library in my hometown of Greenville, S.C. I remember it like it was yesterday, for that day changed my life forever. From that experience, I lost my fear of being jailed for a righteous cause. I went on to meet Dr. King and dedicate my heart and soul to the fight for justice, equality, and equal access. In the tradition of the Apostle Paul, I have offered myself — my mind, body and soul — as a living sacrifice.
"Throughout my career of service, God has kept me in the embrace of his loving arms, and protected me and my family from dangers, seen and unseen. Now in the latter years of my life, at 76 years old, I find it increasingly difficult to perform routine tasks, and getting around is more of a challenge. My family and I began to notice changes about three years ago. For a while, I resisted interrupting my work to visit a doctor. But as my daily physical struggles intensified I could no longer ignore the symptoms, so I acquiesced.
"After a battery of tests, my physicians identified the issue as Parkinson's disease, a disease that bested my father.
"Recognition of the effects of this disease on me has been painful, and I have been slow to grasp the gravity of it. For me, a Parkinson's diagnosis is not a stop sign but rather a signal that I must make lifestyle changes and dedicate myself to physical therapy in hopes of slowing the disease's progression.
"I am far from alone. God continues to give me new opportunities to serve. This diagnosis is personal but it is more than that. It is an opportunity for me to use my voice to help in finding a cure for a disease that afflicts 7 to 10 million worldwide. Some 60,000 Americans are diagnosed with Parkinson's every year.
"I will continue to try to instill hope in the hopeless, expand our democracy to the disenfranchised and free innocent prisoners around the world. I'm also spending some time working on my memoir so I can share with others the lessons I have learned in my life of public service. I steadfastly affirm that I would rather wear out than rust out.
"I want to thank my family and friends who continue to care for me and support me. I will need your prayers and graceful understanding as I undertake this new challenge. As we continue in the struggle for human rights, remember that God will see us through, even in our midnight moments.
"KEEP HOPE ALIVE!
"Rev. Jesse L. Jackson, Sr."

रविवार, 19 नवंबर 2017

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 11,Part 2; Part 3

सत्य का आचरण करते -करते जिसके जीवन में भक्ति की बिंदी आ गई वही संत हो जाया करता है। साधू झूठ नहीं बोलता। भरोसा कर लिया शबरी ने भगवान् आयेंगे ,जिस समय भगवान् इनके द्वार पर आये ये अस्सी बरस की हो गई थीं ,भजन गा रहीं थीं ,पूजा में थीं ,गुरुदेव की चेतना इनके अंदर से बोल पड़ी -ओ सबरी देख ?क्या देखूं ?द्वार पे कौन है ?भगवान्  खड़े थे: 

शबरी देखि  राम बिनि आये, 

मुनि के वचन समुझ जिये आये। 

साधु चरित शुभ चरित कपासू। 

साधु का कहा झूठ नहीं होता सत्य ही सिद्ध होता है। 

अरि शबरी देख !तेरे द्वार पे राम आये हैं  द्वार पर शबरी ने देखा दो राजकुमार आये हैं। गुरु की चेतना जीवित रहती है साथ जाती है इस लोक से उस लोक तक। गुरु शिष्य को नहीं छोड़ सकता ,उसकी मज़बूरी है।शरीर का धर्म होता है शरीर जाया होता है मरता है क्षय होता है शरीर का ,गुरु मरा नहीं करते अंतर्ध्यान हुआ करते हैं। 
स्वामी विवेकानंद के भाषण के शताब्दी समारोह वर्ष के बारे में एक फटॉग्रफर का संस्मरण  "पंजाब केसरी"अखबार  में छपा था जो उस समय फटॉग्रफी के क्षेत्र में एक बालक ही था ,वह भी उस अंतर् -राष्ट्रीय -धर्मसभा में था जिसमें स्वामीजी ने सम्भाषण किया था। इस बालक के पिता ने कहा तुम फोटो खींचो ,इस बालक ने सबके चित्र उतारे और चित्र तैयार करने के बाद होटल के जिन -जिन कमरों में सब धर्मगुरु रुके हुए थे वहां -वहां जाकर  सबके फोटो देकर आया। 
जब यह विवेकानंद जी के कमरे में पहुंचा तो इसने पूछा आपके पीछे एक साधु खड़े हुए थे वे कौन थे मैं उनके चरण छूना  चाहता था ,यदि आप मिला दें तो।  बोले विवेकानंद मुझे तो इस बात का इल्म ही नहीं है के कोई और भी मेरे पीछे खड़ा था। चित्र दिखाओ -देखा चित्र तो परमहंस रामकृष्ण थे उस चित्र में जो आठ वर्ष पहले ही शरीर छोड़ चुके थे जो इस चित्र में विवेकानंद जी के पीछे आभामंडल रूप में खड़े थे।  

सन्देश यही था -गुरु शरीर छोड़ता है उसकी चेतना शिष्य  के साथ -साथ रहती है ,गुरु नहीं मरता है कभी। इस जन्म से उस जन्म तक गुरु का आशीर्वाद साथ रहता है गुरु साथ नहीं छोड़ता। 
आज भगवान् गौतम ऋषि के आश्रम पहुँचते हैं गुरु विश्वामित्र के साथ ,आश्रम जो निर्जन पड़ा है ,यहां एक बड़ी शिला भी पड़ी हुई है। भगवान् पूछते हैं यह क्या  लीला है इतना बड़ा आश्रम और पशु -पक्षी ,जीव -जन्तु विहीन ,नीरव निर्जन प्रदेश -वत शून्य।  
'चरण कमल रज चाहती ' ये जो शिला तुम देखते हो यह गौतम ऋषि की पत्नी थी जिसने बरसों तुम्हारी प्रतीक्षा की ,इस का उद्धार करो।पति गौतम ऋषि के शाप  से यह शिला हो गई थी जिसने इसे त्याग दिया था। 

भारत का साधु भगवान् से भक्त के लिए प्रार्थना ही करता है और कुछ नहीं चाहता। साधू कभी अपना कल्याण नहीं चाहता ।वह समाज का कल्याण चाहता है। भक्ति कथा से आती है। अहिल्या जी का प्रसंग बहुत मार्मिक प्रसंग है जो हमारे अपने जीवन से जुड़ा है। जीवन की समस्याओं से जुड़ा है। अहिल्या जी बुद्धि का प्रतीक हैं  जिसे शतरूपा कहा गया है यह सौ रूप बदलती है। जब कुम्भ चलेगी  बुद्धि भक्तानि रहेगी ,कुम्भ पूर्ण हो जाने के बाद (कथा के बाद) ये मयखाने जायेगी ,धोखा देती है बुद्धि।इसकी बातों में मत आइये।  

गुण और अवगुण साधु और पापी दोनों में बराबर होते हैं सवाल यह है आप  जीवन का कौन सा कमरा खुला रखते हैं सद्गुणों का या दुर्गुणों का।बुद्धि भ्रमित कर देती है। जैसा भी मौसम होता है,वैसी ही हो जाती है । वह वनस्पति ,वह पौध आ जाती है जैसा भी मौसम होता है।  बीज गर्भ में पड़े रहते हैं मौसम के आते ही पौधा ज़मीन से निकलकर आता  है।
पीना छोड़ दिया लेकिन पीने के बीज अंदर पड़े थे ,अगर बीज है और उसका मौसम आया तो वह निकलेगा। अहिल्या का  इंद्र के प्रति शादी से पूर्व आकर्षण था। ब्रह्मा जी की बेटी थी अति सुन्दर भी इतनी के इंद्र  खुद  भी इन पर मोहित थे सम्मोहन का बीज इंद्र के अंदर भी पड़ा हुआ था। आकर्षण का बीज है तो वह ऊपर आएगा मौसम देखकर। 

बुद्धि की मत सुनिए आत्मा की सुनिए। अहिल्या ने अपराध ज़रूर किया लेकिन पति से छिपाया नहीं। पाप छुपाने से बढ़ता है और पुण्य गाने बताने से घटता है ,जिसे हम छुपा कर रखते हैं मरते समय वही हमारे  पास बचता है।

किये हुए कर्म भोगने पड़ते हैं। 

"अवश्यमेव भोक्तम  " 

जो भी भला बुरा है श्री राम जानते हैं ,हमारा जीपीएस हैं श्री राम। 

बन्दे के दिल में क्या है भगवान् जानते हैं। 

आता कहाँ है कोई ,जाता कहाँ है कोई ,

युग युग से इस गति को ,श्री राम जानते हैं। 

चरण कमल रज चाहती कृपा करो रघुवीर -विश्वामित्र भगवान् राम से कहते  हैं :

सन्देश यही है कथा का :पाप हुआ है तो ज़ाहिर कर दो छुपाओ मत। 

गुरु को बतला दो उसके चरणों में बैठकर ,किसी संसारी को नहीं -के मुझसे ये अपराध हो गया। संसारी को बतलाओगे तो वह ब्लेक मेल करेगा ,एक्सप्लॉइट करेगा ,परिवार को  और मित्रों को तो भूलकर भी मत बतलाइये। 

एक दिन गुरु ही पूजा   में बैठकर भगवान् से आपके लिए विनय करेगा -प्रभु कृपा करो इससे अपराध तो हुआ है लेकिन यह क्षमा माँगता है।  

अहिल्या चरण रज चाहती है।कृपा करो रघवीर चरण रज चाहती है यह नारी। 

भगवान् कहते हैं पाप करो - 

पाप तो होगा जैसे मछली बिना जल के नहीं रह सकती ,ऐसे ही मनुष्य बिना पाप के   रह नहीं सकता लेकिन जो कल हुआ वह आज कैसे हो रहा है ,नया नया करो रोज़ ,इसका अर्थ है जानबूझकर किया जा रहा है। पाप करना है तो बड़े से बड़ा करो नित्य नया करो -लेकिन जो जीवन में एक बार हो गया दोबारा नहीं चलता। 

फिर भी पाप हमारे जीवन में मौसम चक्र की तरह घूमता रहता है।चिता के साथ भी चिता  तक भी  नहीं छूटता ,चिता से आगे भी चला जाता है।  साबुन भी है धोने के लिए रोज़ गंदा  करो लेकिन रोज़ धोवो। महापुरुषों के जीवन में एक ही  बार घटना हुई है जानकी जी ने एक बार भूल की है शंकर जी एक बार स्खलित हुए हैं ,विश्वामित्र जी एक बार पतित हुए हैं नारद जी एक बार गिरें हैं दोबारा नहीं ,अहिल्या जी एक बार गिरीं हैं दोबारा नहीं।हम रोज़ -रोज़ गिरते हैं।  

कल  केवल मलमूल मलीना। पाप पयोनिधि जल बिन बिना मीना। 

अहिल्या जी का उद्धार हुआ। भगवान् ने कृपा कर दी भगवान् ने गौतम ऋषि  को बुला लिया गौतम जी  अहिल्या  जी को बुला लीजिये। अहिल्या जी से पवित्र दूसरी नारी नहीं है।

प्रभु आगे की यात्रा में   गंगा जी के किनारे आये हैं गंगाजी को देखकर भगवान् बैठ गए -पूछने लगे ये दिव्य नदी कौन है ?ऐसी नदी तो हमने स्वर्ग में भी नहीं देखी । गुरूजी कहते हैं गंगा को नहीं पहचानते आपके श्री कदमों से ही तो निकली है। भगवान् गंगा जी की कथा सुनना चाहते हैं।  

 भगवान् अब  गंगा की कथा सुनना चाहते हैं। 

जेहि प्रकार सुरसरि मुनि   आई ,

राम बिलोकहिं  गंग  तरंगा ,

 गंग  सकल मुद मंगल मूला। 

सब सुख करनी हरणी  सब शूला ....  

सब प्रकार के पाप का नाश करने वाली गंगा जी हैं। भक्ति कथा  के बिना नहीं आएगी। भगवान् सारे रास्ता कथा ही सुनते जा रहे हैं।अभी गौतम जी की स्त्री की कथा सुनी अब गंगा जी की कथा सुन रहे हैं। क्षिप्राजी गंगा जी की सगी बहन हैं क्षिप्रा जी भगवान् विष्णु के हृदय से निकलीं हैं और गंगा श्री चरणों से। प्रतिदिन गंगा में स्नान कीजिये। हरिद्वार उज्जैन को आप घर बुला सकते हो। वहां जाने की जरूरत नहीं है।कहीं भी नहाइये बस गंगा जी का आवाहन करिये हर- हर गंगे जैशिवशंकर। हर -हर गंगे जैशिवशंकर। अगर इतना बोलते हुए आपने स्नान किया तो आपको  लगेगा उज्जैनी ही नहाकर आये हैं हर की  पौड़ी ही  से नहाकर आये हैं।आखिर बाथ  रूम में आप मौज़ में होते हैं कुछ न कुछ हर व्यक्ति  गाता ही है। चुपचाप नहीं नहाता है मुक्त होता है  स्नानघर में आदमी।नित्य अपनी बाल्टी में बुलाओ गंगा जी को। 
कुछ न कुछ गंगा धाम पर जाकर दान करिये चाहे एक कप चाय ही पिला दो किसी साधू को। एक छोटी बुराई आप जो छोड़  सकते हैं ज़रूर छोड़िये।ये माँ है गंगा और क्षिप्रा इसकी सगी बहिन है और हर माँ यह चाहती है मेरा बेटा बाप की गोद  में जाए। कभी भी बाप गंदे बच्चे को गोद  में नहीं रखता मैले कुचैले बच्चे को नहीं उठाता, जगत का पिता भी :

मोहि कपट छल छिद्र न भावा ,
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। 

माँ ही बच्चे को निर्मल करती है उसका मलमूत्र धौती  है ताकि बच्चा नहाकर बाप की गोद में जा सके ।

रास्ते में एक बहुत सुन्दर बागीचा पड़ता है राम लक्ष्मण जी के साथ विश्वामित्र वहीँ  ठहर जाते हैं। समाचार जनक जी को पता चलता है :

विश्वामित्र महामुनि आये ,

समाचार मिथिला पति पाये । 

जैसे ही जनक जी को पता चला सेवक सचिव अपने भाई को लेकर बागीचे में आये।   

संतों के दर्शन अगर आपके शहर में आये हैं उनके दर्शन ज़रूर करिये। क्योंकि संत भगवान् के पार्षद होते हैं।

जब संत मिलन हो जाये  , 

तेरी वाणी हरि गुण गाये ,

तब इतना समझ लेना ,

अब हरि से मिलन होगा।

बाग़ में दर्शन करने आये जनक जी बोले -गुरुवर मुझे तो स्मरण नहीं होता मैंने कभी कोई  पुण्य किया है ज़रूर मेरे पूर्वजों का पुण्य होगा जो आप मेरे नगर में आये।आपका मुझे दर्शन हो गया  राघव के रूप का जादू निर्गुण निराकार पर चल गया -जनक पूछने लगे ये दोनों बालक हैं या पालक हैं ?मुझे बताओ।
संत अगर आता है तो समझिये पीछे -पीछे राम जी भी आ रहें हैं। जनक के  हाथ जुड़ गए भगवान को देखकर। विश्वामित्र जी से बात करना भूल गए जनक जी। 



मुनि कुल तिलक के नृप कुल  पालक  

ब्रह्म जो कही नेति कही गावा   

इन्हहिं बिलोकत अति अनुरागा ,

बरबस ब्रह्म सुकहिं मन जागा। 

विदेह देह में डूब गये। 

जो वस्तु ,व्यक्ति और विषय से प्रसन्न या  अप्रसन्न होता है वह संसारी है ,जो असुरक्षा में जीता है वह संसारी है। 

जो निश्चिन्त रहता है हर हाल में मधुकरि या भिक्षा मिले या न मिले ,जिसकी प्रसन्नता या अप्रसन्नता किसी वस्तु विषय या व्यक्ति से नहीं जुडी है वह साधु है।जो परिश्थितियों की सवारी करता है ,जो आज के आनंद में है वह साधु है।
जो परिस्थितियों से विचलित होता है  वह संसारी है।

सीता राम ,सीता राम ,सीता राम कहिये ,

जाहि विधि राखै राम, ताहि विधि रहिये   . 

आ गए राज भवन में विश्वामित्र राम लक्ष्मण के साथ। जनक के आग्रह पर। 

'करो सुफल सबके नयन ,

बेटा सुंदर बदन दिखाओ' -ये निर्गुण के उपासकों का नगर है। ज़रा इन्हें  सगुण  के दर्शन कराओ। 

"जाहि देख आवहु  नगर ... सुखनिधान दोउ भाई ,

बेटा सुफल करो सबके नयन सुंदर बदन दिखाओ। " ये विदेह नगरी है इन्हें सगुण साकार का भी आस्वाद कराओ।विश्वामित्र ने दोनों को नगर देखने भेज दिया। 

समाचार पुर वासिन पाये  ,

देखन नगर आये दोउ भाई। -कौन हैं कहाँ से आये हैं ये राजकुमार इतने कोमल इतने सुन्दर, नगर वासियों की आखों में यही सवाल है ?

युवती भवन झरोखेहिं   लागीं  ..... 

वर सांवरो जानकी जोग ....  सखियाँ आपस में बतियाती हैं अरि ये सांवरो तो जानकी के योग्य है लेकिन ये तो बहुत कोमल है। धनुष कैसे उठाएगा ,दूसरी बोली इसका सौंदर्य देखके जनक अपनी प्रतिज्ञा बदल देंगे ,स्वयंवर में धनुष तोड़ने की शर्त ही समाप्त कर देंगें। एक  बूढ़ी नब्बे साला  बोली -अब इनका दर्शन तो बार -बार होगा ,जनक को जानकी बहुत प्यारी हैं जब ससुराल चली जाएंगी तो जनकजी , जल्दी -जल्दी बुलाया करेंगें ,ये दोनों विदा कराने आया करेंगे। हमें भी इन दोनों राजकुमारों का दर्शन हो जाया करेगा।सखियाँ अपनी सुध -बुध खोने लगतीं हैं एक भगवान से कहती है अब हमारा दिल तो हमारे पास रहा नहीं हम वगैर दिल के कैसे ज़िंदा रहेंगी ,आत्महत्या कर लेंगी। भगवान् बोले आत्महत्या की जरूरत नहीं है।  

भक्ति अगर घर में है तो -भगवान् को आना ही पड़ेगा।

द्वापर में आना सब ,सबको ले चलूँगा। इस बार तो मैं एक पत्नी का ही व्रत लेकर आया हूँ। 

सुन सखी प्रथम मिलन की बात -अब भगवान् और भक्ति सीता का जनक वाटिका में  मिलन होने वाला है।आगे का प्रसंग बड़ा सुन्दर है। ध्यान से सुनिए :

"लेंहिं  प्रसून चले दोउ भाई "-माली को चाचा जी कहके प्रणाम किया भगवान् ने । यही भगवद्ता है जो छोटे को बड़ा कर दे।माली कहने लगा भगवान् नहीं ऐसा मत करिये कहाँ आप और  मैं कहाँ  ?

 आज समाज में वह बड़ा माना जाता है जिसके सामने सब छोटे दिखाई दें। 

आ गया सम्पर्क में  जो ,धन्यता पा गया -

इधर श्री किशोरी जी का सखियों के साथ वाटिका में प्रवेश हो रहा है। उधर भगवान् ने वाटिका में प्रवेश लिया है। 

पूजन की करने तैयारी ,  सखिन  संग आई जनक लली.......

बीच, सिया -कुमारी सखिन  संग ,आईं जनक की  लली ...

निर्मल नीर नहाई  सरोवर ,

अरे शिवजी के मंदिर पधारीं  ,

सखिन  संग ,आईं जनक लली। 

अब शादी कल करेंगे ,आज की कथा को विराम देते हैं। 

जयश्री राम !

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१ )

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 11 Part 2,and Part 3


(२)https://www.youtube.com/watch?v=Z2ZvKCVsqJ4

(३)

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 11,Part 2; Part 3

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 11 Part 1



कल विश्वामित्र जी दशरथ जी के भवन में आये -मांग करते हैं :

अनुज समेत देओ रघुनाथा 

असुर समूह सतावहिं मोहिं ,

मैं आचन  आयहूँ   नृप तोहि 

अनुज समेत देओ रघुनाथा ,

निशिचर वध मैं होवहुँ सनाथा। 

और किसी भी राजा के लिए यह बहुत दयनीय अवस्था है सज्जन शक्ति को अपनी सुरक्षा की गुहार करने के लिए राजदरबार आकर रोना पड़े उस राजा को कहाँ जगह मिलेगी आप सोच सकते हैं।  प्रभु  इस दृश्य को देख रहें हैं बोले तो कुछ नहीं लेकिन मन ही मन में निश्चय कर लिया -एक नहीं कई निश्चय उन्होंने उस  समय कर लिए :

(१)एक पत्नीव्रत ,जबकि दशरथ जी को ३५० रानियां थीं 

(२)मैं भोग के लिए राजगद्दी स्वीकार नहीं करूंगा ,सेवा के लिए करूंगा ,और जब सेवा की आवश्यकता पड़ी एक जानकी जी का भी त्याग कर दिया। जगत कल्याण के लिए लोकरंजन लोक प्रसन्नता के लिए उनका भी त्याग कर दिया। 

दशरथ जी ने कभी राज्य का भ्रमण  किया ही नहीं उन्हें ये भी नहीं मालूम -मेरे राज्य में मेरे देश में सज्जन-शक्ति की साधु -संतों की ,सज्जन - पुरुषों की क्या स्थिति है वे यज्ञ आदि अनुष्ठान भी कर पाते हैं या नहीं ,पुत्रेष्ठि यज्ञ कर पाते हैं या नहीं क्योंकि संतान तो दशरथ को जब तक थी नहीं जब तक श्रृंगी ऋषि ने आकर यह यज्ञ संपन्न नहीं करवाया। 
जो कुछ भी समृद्धि राज्य की होती है वह धार्मिक अनुष्ठानों से होती है चाहे वर्षा हो चाहे फसल पके ,क्योंकि मनुष्य का जीवन देवताओं के आधीन है और हमारे मालिक सबके देवता हैं और उनकी तृप्ति  के लिए यज्ञादिक  अनुष्ठान होते नहीं थे।देवता प्रसन्न होते हैं यज्ञ अनुष्ठान से और राक्षस ऐसे अनुष्ठान होने नहीं देते थे ।  
ताड़कादिक और राक्षस  आकर मार देते थे  संतों को ताकि देवता उनके यज्ञादि करने से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद न दे सकें। 
साधू संपत्ति मांगने नहीं सम्मति (संतति )मांगने आता है। सत्ता उस समय साधू की खुशामद करके उसे बुलाती थी आज स्थिति अलग है। नेता जी का फोटो मंदिर और संतों के घर में जगह पाता  है। ट्रांसफॉर्मर में जितना ज्यादा वोल्टेज होगा करेंट भी उसी के अनुरूप होगा। कुम्भ में आकर दोनों आवेश ग्रहण करते हैं व्यक्ति भी ट्रांसफॉर्मर भी ,जनसाधारण भी और संत भी। 

 किसी  विशिष्ठ साधु की वाणी में ही तेज़ होता है वशिष्ठ  जी विशिष्ठ ही थे। राजन को कहते हैं राजन आज यज्ञ संस्कृति पर संकट है ,दे दो क्योंकि तुमको ये चारों पुत्र यज्ञ के द्वारा ही मिले हैं और जब  यज्ञ  ही सुरक्षित नहीं रहेंगे तो भविष्य में कोई पुत्रेष्टि यज्ञ  भी नहीं कर पायेगा। 

दो पुत्र उसी संस्कृति के अनुरक्षण के लिए दो ,दो अपने पास रखो। 

साधू ने बोला और सत्ता झुक गई 

अब दशरथ जी बोले ले  जाइये !मुनिवर ले जाइये अब आप ही इनके माता पिता हैं ।राम लक्ष्मण गुरु विश्वामित्र को सौंप दिए कहते हुए : 

तुम मुनि मातु पिता अब -

"विश्वामित्र महाधन पाई "-विश्वामित्र लिफाफा लेने नहीं गए थे "परमधन" लेने गए थे। 

"हमारो धन राधा राधा राधा ,

जीवन धन राधा श्री राधा श्री राधा। "

साधु का परमधन होता है 'भजन', वह वहां परलोक में जमा होता है यहां इस लोक के बैंक में जमा नहीं होता। 

रघुवंश में स्त्रियों का वध नहीं होता ,निषेध है इसका लेकिन विश्वामित्र बोले -राम ये पाप का मूल है। राक्षत्व की जड़ है। 
ताड़का का वध किया रामजी ने -ताड़का स्त्री नहीं थी राक्षसों की जननी   थी ,आसुरी प्रवृत्तियों की पोषक थी । दुराशा थी ,और दुराशा आशा को खा जाती है।

आशा सिर्फ राम से करो और जगह करोगे तो उपेक्षा मिलेगी। 

आशा एक राम जी से दूजी आशा छोड़ दो।  
सुबाहु का वध क्यों किया इसके बाद राम ने ,सुबाहु तो होता  है अच्छी बाजू वाला। सुन्दर बाजू थीं सुबाहु की बलिष्ठ थी बड़ी थीं लेकिन ये विशाल हाथ धर्म को सताने के लिए नहीं चाहिए ,ये सुबाहु लम्बी भुजाओं से धर्म संस्कृति को ही नष्ट कर रहा था। इसलिए राम कहते हैं इसको मैं मिटाता हूँ। 

मारीच (स्वर्ण मृग )को राम ने मारा नहीं ,मार नहीं सकते थे राम भी इसीलिए उसे सौ योजन दूर फेंक दिया ,मारीच (स्वर्ण मृग )के पीछे मनोहर कल्पनाओं के पीछे तो रामजी को भी दौड़ना पड़ा ,मोह का रावण अनेक नाटक करके आता है धोखा देकर। लक्ष्मण जैसे जागृत को भी धोखा देकर रावण सीता का अपहरण करके ले गया था।राम अपनी इन्हीं मनोहर कल्पनाओं के पीछे सीते  -सीते कहते दौड़ते हैं। सीता तो भक्ति को कहते हैं। यही है सन्देश कथा का। 

कथा मन के मालिन्य को धोने का साधन भी है साबुन भी। 
मनोहर कल्पनाओं को थोड़ा दूर रखा जा सकता है। राघव ने आकर यज्ञ संस्कृति को पुनर्जीवित कर दिया।विश्वामित्र की ही रक्षा नहीं की उनके मार्फ़त एक पूरी यज्ञ संस्कृति को बचा लिया राक्षसों का वध करके। 

विश्वामित्र बोले अभी एक यज्ञ और पूरा होना है :धनुष यज्ञ 

यह इच्छा विश्वामित्र जी ने तब प्रकट की जब राघव और लक्ष्मण दोनों गुरु विश्वामित्र की चरण सेवा कर रहे थे -विश्वामित्र बोले बेटा एक यज्ञ तो तुमने पूरा कर दिया अभी एक यज्ञ और अधूरा पड़ा है राघव बोले वह कौन  सा यज्ञ है ? 

जैसे ही विश्वामित्र ने धनुष यज्ञ बोला जानकी जी उनके मानस में आ गईं ,भक्ति बनके। जानकी जी भक्ति की प्रतीक हैं।भगवान् को मानसिक रूप से सीता जी दिखाई देने लगीं।  

भक्ति से मिलने के लिए भगवान् राम लालायित हो जाते हैं। 

"मंगल मूल लगन  दिव आया ,

हिम ऋतु  अगहन मास सुहावा। "

जनकपुर की पावन यात्रा के लिए भगवान् अपना दायां श्री  चरण आगे बढ़ाते हैं :पावन कदम बढ़ाते हैं :

धनुष यज्ञ सुनी रघुकुल नाथा ,

हर्ष चले मुनिवर के साथा।

जनकपुर की यात्रा माने भक्ति की यात्रा।  जीवन में भजन प्राप्त करने की यात्रा। बिना गुरु के साधन के न भक्ति प्राप्त होती है न भजन। भक्ति फलित होती है गुरु की कृपा से। भजन सफल होता है  गुरु के आशीर्वाद से। शास्त्र पढ़ने से बुद्धि बढ़ सकती है तर्कणा शक्ति बढ़ सकती है.

 भजन फलित होता है गुरु के सानिद्य से। गुरु अपने शिष्य को ऐसे सेता है जैसे पक्षी अपने अण्डों को सेता है।जो गुरु की रेंज में रहेगा वह पकेगा उन अण्डों की तरह जो मुर्गी के , पंखों के नीचे होते हैं।गुरु के साथ ही नहीं रहना है गुरु के पास भी रहना है। साथ रहना बहुत ज़रूरी नहीं है।पास रहना आवश्यक है। जो अंडे पंखों से बाहर रहते हैं वह सड़  जाते हैं। 

पास होने का मतलब मानसिक रूप से पास होना है ,गुरु की इच्छा में जीना है गुरु के आदेश को मानना है ,गुरु के आचरण में जीना है वैसे जीना है जो गुरु को पसंद है वैसा आचरण व्यवहार करना है  जो गुरु को पसंद है , फिर चाहें गुरु से कोसों मील दूर हों आप। 

मूर्ख शिष्य और लोभी गुरु :गुरु के साथ रहने से कई बार ईर्ष्या  के अलावा और भी खतरे पैदा हो जाते हैं। कथा है एक लालची गुरु थे। उनके दो चेले थे। गुरु ने जो मांग जोड़ के संजोया था वह सब जो भी थोड़ा बहुत था  एक पोटली में बाँध के रखते थे। चाबी अपने पास रखते थे। 
गुरु के दो शिष्य थे। दोनों की नज़र गुरु की पोटली पे रहती थी। सेवा का नाटक करते थे पहले मैं करूंगा ,दूसरा कहता पहले मैं चरण सेवा करूंगा गुरु जी की। गुरु जी ने कहा लड़ते क्यों हो ,एक -एक पैर बाँट लो। एक तुम दबा दो दूसरा  तुम।

चेले ऐसा ही करने लगे। एक बार एक चेला आश्रम से बाहर चला गया। रात हुई दूसरा गुरु जी का अपने हिस्से वाला पैर दबाने लगा। थोड़ी देर बाद अचानक गुरूजी ने करवट ली तो गुरु जी का दूसरा पैर इसके पाँव पर आ गया। चेला आपे  से बाहर हो गया। 

तेरी ये हिम्मत मेरा पाँव दबाएगा। लाठी लाया और गुरु जी पे पिल पड़ा। दूसरा जब बाहर से आया तो पूछा गुरु जी ये हाल कैसे हो गया। बूढ़े गुरु ने सब बयान कर दिया। अब दूसरा शिष्य अंदर गया और जलती हुई लकड़ी लाकर गुरु जी को मारता रहा जब तक वो मर ही न गए कहते हुए तेरी ये हिम्मत मेरे पैर का ये हाल कर दिया। उसने दूसरा पैर भी तोड़ दिया। 

इसलिए गुरु के आदेश में रहना ,गुरु की साँसों में जीना ज़रूरी है गुरु अपनी साधना  संपत्ति शिष्य को ही देकर जाता है। गुरु की चेतना कभी समाप्त नहीं होती ,गुरु प्रकट होते हैं और अंतर्ध्यान हो जाते हैं गुरु शरीर नहीं हैं ,तत्व हैं। गुरु के संकेतों को समझना और उनके अनुसार जीना है । 

आपका एंटीना गुरु से जुड़ा होना ज़रूरी है।गुरु के साथ रहते हुए भी यदि उसके संकेतों को नहीं समझोगे तो  पत्थर ही रहोगे।  
अगला प्रसंग आगे शबरी का है :
शबरी नाम की लड़की को अठारह बरस की उम्र में मतंग ऋषि छोड़कर चले गए कहकर बेटी तेरे द्वार पर एक दिन राम आएंगे। पुरुष वेश में पहली बार जो तेरे द्वार पे आये समझ जाना राम आये हैं ,गुरु की वाणी सत्य होती है। 

(ज़ारी )  

सन्दर्भ -सामिग्री :

(१)https://www.youtube.com/watch?v=4PNoII8M9To

(२ )0

Vijay Kaushal Ji Maharaj | Shree Ram Katha Ujjain Day 11 Part 1

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